Thursday, 14 December 2023

भारतीय संसद पर गैरकानूनी प्रवेश या फिर हमला

आज बहुत दिनों के बाद फिर लिखने का मन कर रहा है। विशेष रूप से जब हमारी जन्मभूमि के निर्वाचित प्रतिनिधियों को टीवी पर हाथ-पायी करते हुए देखा / पाया। मैं सोच रहा था कि जब राष्ट्रीय चुने हुए प्रतिनिधि मार पीट कर सकते हैं और कानून को हाथ में लेंगे तो देश के सामान्य नागरिक से क्या अपेक्षा है।

कल भारतीय संसद (निचले सदन) पर दो नवयुवक गैर कानूनी रूप से घुसे और सदन को रंगीन धुएं से भर दिया। इन युवाओं का कृत्य तो कानून देखेगा ही | मेरी राय में सभी संबद्ध लोगों को कानून के कड़े से कड़े रूप को दिखाना चाहिए और उन्हें कानून की ताकत का एहसास भी करवाना होगा। ताकी भविष्य में ये युवाओं को उनके गैर जिम्मेदार कृत्य के गंभीर परिणामो से रोबरूह हो सके।

मगर मेरा प्रश्न अपने राष्ट्रीय चुने हुए प्रतिनिधियों से है कि क्या उनकी ये जिम्मेदारी नहीं है कि वो सामान्य जनता को कानून का पालन करते हुए दिखायी दें | क्या उनका मार पीट का कृत्य शोभनिया था ये उनको सोचना है। क्योंकि जब पब्लिक ठीक से इसका विशलेषण करेगी तो वो सवाल भी पूछेगी कि आखिर ये सब हुआ कैसे और आपने कानून हाथ में कैसे ले लिया।

अभी और सत्य आना बाकी है क्योंकि जब कोर्ट में केस चलेगा तो परत दर परत आरोपी के मकसद का भी खुलासा होगा और ये भी पता चलेगा कि कैसे सुरक्षा में चूक हो गई।

अपनी रक्षा का कानून क्या इतना लचीला हो सकता है कि हम लोग आसानी से कानून को अपने हाथ में ले? जबकी किसी के जीवन पर कोई संकट ना पड़ रहा हो | क्या हमारे प्रतिनिधि उस युवा को केवल पकड़ नहीं सकते थे और मारना क्यों जरूरी था? सजा देने का काम तो कानून का है | हमारे सार्वजनिक प्रतिनिधि क्या ऐसा नहीं समझते? और कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी क्या सरकार की नहीं होती है? क्या पूर्व धमकी की नजरंदाज तो नहीं किया गया सरकार द्वार अपने ओवर कॉन्फिडेंस में।

क्या कोर्ट हमारे प्रतिनिधियों के गैर कानूनी कृत्यों के लिए भी फैसला करेगा ?  क्या उनको हम और हमारा समाज कानून से ऊपर मान चुका है? ये सोचना मैं आपके विवेक पर छोडता हूं और ये भी आपके सोचने के लिए रखता हूं कि आखिर देश का नौजवानों में ये देश द्रोही भावनाएं आ क्यों रही हैं। 

मेरी समझ में ये दोनों ही विषय कानून समीक्षा में चर्चित होने चाहिए, अभी देखना बाकी है।

Monday, 1 January 2018

सुनिए प्रधान मंत्री मोदी जी

प्रधान मंत्री मोदी जी आज अंग्रेजी का नया साल है और आपका सत्ता में भी लगभग ३ साल हो गया है. आपकी वाक् पटुता भी अब पुरानी सी  हो गयी. अब समय आ गया है की आपसे भी कुछ प्रश्न पूछे जाएँ. तो सोचा आज कुछ आपको याद करा दें की आप ने भारत की जनता से क्या वादे किये थे २०१४ के चुनाव के दौरान और उसके तुरंत बाद.  परन्तु सबसे पहले आपको और देश की जनता को हार्दिक शुभ कामनाएं नव वर्ष पर. 

सबसे ऊपर तो नाम आता है 'अच्छे दिन' और 'मौनी बाबा' का.  यदि याद न आ रहा हो तो थोड़ा विस्तार से....चुनाव जीतने के तुरंत बात (यदि मुझे सही याद पड़ता है तो ) सबसे पहले आपने बड़ोदरा (गुजरात) के विजय रैली में कहा था 'अच्छे दिन........ ' और जनता ने उत्तर दिया  था.....'आ गए'..... या यूँ कहें की आपने अपनी बात जनता के मुँह से कहलवाई थी की 'अच्छे दिन आ गए'. और दूसरी बात सारे चुनाव प्रचार के दौरान आपने तत्कालीन प्रधानमत्री डॉ मनमोहन सिंह जी को हमेशा मौनी बाबा का ही खिताब दिया था और आप कहते फिरते थे कि........ अरे भाई डॉ साहेब / प्रधानमत्री जी कुछ तो बोलिये....  

अच्छे दिन का तो मैंने बाद में थोड़ा विस्तार से विश्लेषण किया है और अगर मौनी बाबा का ध्यान किया जाये तो अभी हाल में मुंबई में भारत की युवा पीढ़ी के २१ लोग आग की भेंट चढ़ गए और आपकी एक ग्लैमरस लोक सभा सदस्या जी इसका कारण भारत की बढ़ती हुई जनसँख्या करार दे देती हैं. गौ हत्या के नाम पर कुछ सामाजिक तत्त्व गुंडा गर्दी करते फिर रहे हैं और आप मौन हैं. या फिर कुछ समय पहले रेलवे के एक पुल पर भगदड़ मचने से कुछ नागरिक अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं और आपके मुँह से एक शब्द भी  नहीं निकलता 

आज आप (गुजरात और हिमाचल चुनाव के दौरान ) कह रहे हैं की मैं नीच जाती का हूँ (श्री मणि शंकर अय्यर साहेब के अल्प या सिमित हिंदी भाषा के प्रयोग /ज्ञान पर चुटकी लेते हुए) या फिर लोगों को याद दिला रहे है कि कभी कांग्रेस का १८ राज्यों में सरकार थी और आपकी याने बीजेपी की अब १९ राज्यों में सरकार हो गयी है. क्यों मासूम भारतीय जनता का मन बहला रहे हैं.  यह आप भी और कोई भी समझ दार व्यक्ति समझता है कि अय्यर साहेब का अर्थ वह तो कतई नहीं था जो आपने जनता को समझया था. और उससे भी विशेष यह कि आपके कुछ भी कहने पर आप के ख़ास सिपहसालार, या कहें श्री अमित शाह जी और उनकी टीम जैसे बहुत सारे प्रोफेशनल राजनीतिक मैनेजर, शुरू हो जाते हैं उसका अर्थ और उनके भी अंदर का अर्थ बताने के लिए देश के सारे अखबार और टेलीविज़न चैनलों पर. 

इसके बात अगर और बातें याद ही कराई जाये तो उनमे 'परिवारवाद', 'काला पैसा', 'आदर्श गाव, गाय-गंगा ('नमामि गंगे'), 'स्वच्छ भारत', 'बुलेट ट्रैन,  'योग', 'मंदिर', 'स्वदेशी'  इत्यादि इत्यादि। ..... 

परिवारवाद, कांग्रेस के अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जी को आपने हमेशा राजकुमार कह कर पुकारा और डॉ मनमोहन सिंह को रबर स्टाम्प. मगर आपको याद दिला दें की बीजेपी में भी राजकुमारों का भी जलवा है, वह चाहे हिमाचल से हों,  कर्णाटक से, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश से हों या फिर पंजाब से. 

काला पैसा, डॉ मनमोहन सिंह जी की देश भक्ति पर प्रश्न उठाना आपको शोभा नहीं देता है. आपको अभी भी सिद्ध करना है की आपकी देश भक्ति डॉ मनमोहन सिंह जी देश भक्ति से बड़ी न सही तो समकक्ष तो अवश्य है. क्योंकि उनका एक अर्थशास्त्री के रूप में योगदान पूरे देश के विकास में अभी कोई भूला नहीं है. आप तो उन्हें पाकिस्तान के दूत से मिलने पर देश द्रोही तक करार देते हैं.  आप एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अभी भी काम कर रहे हैं और आपके योगदान का सम्पूर्ण देश के विकास के लिए आंकलन किया जाना बाकी है.

स्वच्छ भारत, एक बानगी, मेरा जन्म स्थान मूलतः लखनऊ शहर है. और अभी भी मैं नियमित रूप से भारत भ्रमण पर लखनऊ यदा कदा जाता हूँ और अभी हाल के लखनऊ प्रवास के दौरान में एक बच्चे को  लखनऊ के एक मुख्य बाजार, आईटी कॉलेज, में खुले में शौंच करते हुए देखा है. 

आदर्श गांव, अभी हाल के सर्वे मैं पता चला था की आपके ही पार्टी के संसद सदस्यों द्वारा केवल ७ प्रतिशत पैसा ही खर्च हो पाया है देश को उनकी ही लोकसभा क्षेत्र के आदर्श गांव के लिए मिले पैसे का. 

स्वदेशी, अमेरिका के इतने चक्कर आपके जैसे राष्ट्रवादी पार्टी द्वारा उचित प्रतीत नहीं होता और तकनीक कौशल और स्वरोजगार को बढ़ावा  देना निसंदेह आपेक्षित है. 

मंदिर, मैं स्वयं भी ९० के दशक में राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा रहा हूँ और बीजेपी के पितामह श्री अडवाणी जी की रथ यात्रा के सूत्रधार के रूप में आपके योगदान और अनुशासन का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ. इसका कारण है कि हिन्दू बहुसंख्यक देश में भगवान् राम का मंदिर नहीं बन पाया तो विश्व में और कहाँ बनेगा. परन्तु यह क्या १९ राज्यों में सरकार बनाने के बाद भी मंदिर मुद्दे पर आपकी चुप्पी प्रश्न चिन्ह तो लगाएगी ना. और फिर क्या हुआ गाय - गीता और गंगा का. यह सोचने का विषय तो है ही. 

और योग तो ऐसा लगता है की शायद बाबा रामदेव अथवा बाबा बालकृष्ण की ही भारत को देन है तभी तो आज उनका व्यावसायिक क्षेत्रफल विश्व के बड़े बड़े उद्द्योग्पतिओं को अचंभित किये हुए हैं. ऐसा न हो कि भारत की एक अद्भुत और वैज्ञानिक देंन यूँही व्यावसायिक शोषण का शिकार हो जाये।  

बुलेट ट्रैन का तो कहना ही क्या, देखिये क्या होता है जब करोड़ों रुपये की लागत से बनने के बात वह कितनी सार्थक सिद्ध होती है यात्री सुविधाओं और लागत के सन्दर्भ में . यह भी सम्भावना है कि बुलेट ट्रैन निर्णय भी वर्तमान रेलवे के स्थिति और सुविधाओं को बढ़ाने या दुरुस्त करने के निर्णय के ऊपर फिस्सडी ही साबित हो. 

आपसे इन अच्छे दिनों की आशा नहीं है क्योंकि भारत की जनता ने बड़ी आशाओं से आपको भारत का एक आम आदमी समझ कर भारत के प्रधान मंत्री (या आपकी भाषा में प्रधान सेवक) के पद पर आसीन किया था. आपसे यह अपेक्षा थी की आप जो बोलेंगे और जो करेंगे उसमे हम, आम आदमी, अपनी जीवन की रोजमर्रा की समस्याओं का प्रतिबिम्ब देखेंगे परन्तु आपके हाल के चुनाव प्रचार के दौरान राजनितिक प्रपोगंडा से निराशा और हताशा हाथ लगी. कहाँ गया आपका विकास का मंत्र? आपका कभी भी लक्ष्य १९ राज्यों में सरकार बनाने का नहीं था, यह तो इंदिरा जी की कांग्रेस का था लक्ष्य और इसी को पाने के लिए भारत की शायद राजनीति भ्रस्ट और सत्ता लोलुप हो गयी थी और उसने आया राम और गया राम की संज्ञा प्राप्त की. 

यह समय हमारे भारत देश के लिए एक और संक्रमण का काल है, यानी ट्रांजीशन पीरियड।इसका मतलब है की भारत अब निश्चित रूप से विकसित देश बन रहा है. आप, प्रधान मंत्री (सेवक) जी,  इन सब स्वचालित गतिविधिओं का श्रेय नहीं ले सकते। इस संक्रमण काल में भी कुछ विकास की चीज़ें अपने आप हो रही हैं जिसमे आप के होने या किसी अन्य कर्तव्य निष्ट प्रधानमत्री के होने में कोई विशेष अंतर पड़ता नहीं दिख रहा है. यदि आप यह श्रेय लेते भी हैं तो यह वैसा ही होगा जैसा आजादी के बाद पंडित नेहरू ने सारा श्रेय अपने आप ही ले लिया था चाहे वह रेलवे की विस्तार नीति हो, भाकरा नांगल बांध से बिजली  उत्पादन की और या फिर तत्कालीन राज घरानो का भारतीय गणतंत्र में विलय का विषय .

आप तो अर्जुन और आचार्य द्रोण की चिड़िया की आँख की तरह अपनी दृष्टि अपने ही बनाये हुए लक्ष्यों पर जमाये रखिये तो निश्चित रूप से स्वचालित विकास की इस गंगा के स्वरुप को बनाने में आपके योगदान को भी एक प्रधान सेवक के रूप में याद किया जायेगा। भूलिए नहीं कि भारत के प्रधान सेवक से भारत की आम जनता की क्या आपेक्षाएँ हैं. 

इसलिए प्रधान मत्री जी मैं सिर्फ आगाह कर रहा हूँ क्योंकि लोकसभा के अगले आम चुनाव बहुत दूर नहीं हैं और हमारे देश की यह जनता कितनी भी धैर्यवान क्यों न हो इसका भी धैर्य चुकता है और कहीं आपको उसकी कीमत न चुकानी पड़ जाये और आप फिर से बीजेपी के वर्ष १९८० के लोकसभा चुनाव प्रदर्शन की ओर न चल पड़ें। यह भुलाने का भ्रम तो बिलकुल न रखियेगा कि आपका राजनीतिक विकल्प देश में नहीं है क्योंकि यही गलती शायद श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने की थी और उन्ही के सशक्त नेतृत्व के किले को कुशल प्रशाशक मोरारजी भाई और लोक नायक जय प्रकाश जी ने बड़ी ही  आसानी से ध्वस्त कर दिया था.


Friday, 21 April 2017

हिंदी साहित्य का इतिहास - IV : भक्तिकाल १४००-१७०० - भाग दो

भाग दो 

आज का लेख भी भक्तिकाल को ही समर्पित है

जैसा मैंने भक्ति काल के भाग-एक में लिखा है कि अपने इस भाग में हम भक्ति काल के सम्प्रदायों, कवियों और निर्गुण-सगुण  पर चर्चा करेंगे.....

जैसा मैंने  पूर्व में लिखा है कि भक्तिकाल भक्ति की वैचारिक भूमि पर स्थित है. यह भक्ति दो धाराओं में प्रवाहित हुई है - निर्गुण और सगुण। इन दोनों में अंतर केवल इतना है की निर्गुण मत के इष्ट न तो अवतार लेते हैं और ना ही लीला ही करते हैं, अर्थात वे निराकार हैं. वहीँ दूसरी और सगुण मत के इष्ट अवतार लेते  हैं और लीलाएं भी करते हैं. अतः सगुण मतवाद में विष्णु के २४ अवतारों में से अनेक की उपासना होती थी, यद्यपि सर्वाधिक लोकप्रिय और लोक पूजित अवतार राम और कृष्ण ही हैं.

१. भक्ति के सम्प्रदाय
मुख्यत: चार संप्रदाय प्रचलित थे और वह हैं
- श्रीसम्प्रदाय - आचार्य रामानुजाचार्य, रामानंद आदि और इसमें राम की भक्ति और उपासना की प्रमुखता है
- ब्रहम्म संप्रदाय - आचार्य मध्वाचार्य और चैतन्य महाप्रभु और इसमें कृष्ण की प्रमुखता से भक्ति पर जोर है
- रूद्र संप्रदाय- आचार्य बल्लाभाचार्य, सूरदास आदि और इसमें कृष्णा की उपासना पर जोर था
- सनकादि संप्रदाय - आचार्य निम्बकाचार्य और इसमें राधा की प्रधानता थी

२. सूफी साधक
- भक्ति काल इतना व्यापक और मानवीय था की उसमे हिन्दू के साथ साथ मुस्लमान भी आये.
-  सूफी साधना का प्रवेश भारत में १२वी शती में मोइनुद्दीन चिश्ती के समय से मिलता है
- सूफी साधना के चार संप्रदाय प्रचलित हैं. चिश्ती, सोहरवर्दी, कादरी और नक्शबंदी
- सूफी मुसलमान थे लेकिन उन्होंने हिन्दू घरों में प्रचलित कथा और कहानियों को अपने काव्य का आधार बनाया।
- आचार्य रामचंद शुक्ल जी ने इसीलिए जायसी आदि सूफी कवियों को सूर, कबीर, तुलसी के ही समकक्ष रखा है.

३. अन्य सन्त
आधुनिक हिंदी क्षेत्र से बाहर पड़ने वाले दो संत कवियों - महाराष्ट्र के नामदेव (१३वी शती) और पंजाब के गुरु नानक देव (१५वी शती) ने भी हिंदी में रचना की हैं।  नामदेव पहले सगुणोपासक थे परन्तु अनुमानतः ज्ञानदेव जी के संपर्क में आने पर वे निर्गुणोपासक बन गए थे, इसलिए ही उनकी रचनाएँ सगुणोपासना और निर्गुणोपासना दोनों से सम्बंधित थी. गुरु नानक देव जी का सम्बन्ध की संप्रदाय से नहीं जोड़ा जा सकता है और इसलिए उनकी रचनाएँ कबीर की भांति थी परन्तु उतनी प्रखर नहीं थी.

४. भाषा, काव्यरूप और छंद
देश के मध्य देश की काव्य भाषा हिंदी-ब्रजभाषा का बहुत प्रचार प्रसार हुआ.  नामदेव ने मराठी और गुरु नानक देव ने पंजाबी भाषा के साथ साथ ब्रजभाषा (और खड़ी बोली) का भी प्रयोग किया। इसलिए भक्ति काल की मुख्या भाषा ब्रजभाषा ही रही. दूसरी भाषा भक्तिकाल की अवधी रही परन्तु ब्रजभाषा जैस व्यापक नहीं। अवधि में काव्य रचना प्रधानतः राम परक और अवध क्षेत्र के कवियों द्वारा ही हुई है. हिंदी के सूफी कवि भी मुख्यतः अवध क्षेत्र से ही थे.
                       भक्ति साहित्य अनेक छंदों और विधाओं में लिखा गया, किन्तु गेयपद और दोहा-चौपाई में निबद्ध कड़वक बद्धता उसके प्रधान रचना रूप हैं. नामदेव, नानक, कबीर, सूर, तुलसी, मीराबाई आदि ने गेयपदों में रचनाएँ की हैं वहीँ

५. निर्गुण काव्य - ज्ञानाश्रयी शाखा
कबीर, रैदास, गुरु नानक, दादू दयाल आदि ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि कहे गए हैं क्योंकि इन संतों ने 'ज्ञान' पर सूफियों की अपेक्षा अधिक बल दिया।

६. निर्गुण काव्य - प्रेमाश्रयी शाखा
मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन आदि प्रेमाश्रयी शाखा की कवि हैं. सूफी काव्य के साथ साथ शुद्ध लौकिक प्रेम आख्यानों की परंपरा भी चलती रही. यह लौकिक प्रेम आख्यानों की परंपरा बहुत प्राचीन है जो ऐतिहासिक या कल्पित व्यक्तिओं के साथ किसी राजकुमारी, श्रेष्ठि पुत्री, गणिका या फिर अप्सरा के प्रेम कथा का वर्णन करती है. कालिदास ने मेघदूत में 'उदयन कथा कोविद' इसका उत्तम उदहारण है. जायसी द्वारा रचित पद्मावत प्रेम की पीर की व्यंजना करने वाला विशद प्रबंध काव्य है. यह काव्य चित्तोड़ के शासक रतनसेन और सिंघल देश की राजकन्या पद्मिनी की प्रेम कहानी पर आधारित है.

७. सगुण राम भक्ति शाखा
तुलसीदास और नाभादास इस शाखा के मुख्य कवि हैं.  राम की उपासना निर्गुण और सगुण दोनों भक्त करते रहे हैं. राम नाम की उपासना कबीर और तुलसी दोनों करते हैं. अंतर राम के अर्थ को लेकर है. कबीर के राम दशरथ सुत नहीं है किन्तु तुलसी के राम दसरथ सुत हैं. हिंदी क्षेत्र के राम भक्त कवियों का सम्बन्ध रामानंद से है. रामानंद जी राघवानंद के शिष्य और रामानुजाचार्य की परंपरा के आचार्य थे. सभी वर्णों के लोग उनके शिष्य हो सकते थे. हिंदी के निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार के संत कवियों का सम्बन्ध उनसे जुड़ता है.

८. सगुण कृष्ण भक्ति शाखा
सूरदास, मीराबाई, रसखान, रहीम आदि इस शाखा के कवि हैं. महाप्रभु वल्लाभाचार्य ने कृष्णा भक्ति की दार्शनिक पीठिका तैयार की थी और देशाटन करके इस भक्ति का प्रचार भी किया। श्रीमद्भागवत के व्यापक प्रचार से माधुर्य भक्ति का चौड़ा रास्ता खुला और वल्लाभाचार्य ने दार्शनिक प्रतिपादन और प्रचार से उस रास्ते को सामान्य जान-सुलभ कराया।


                   इस प्रकार हम देखते हैं कि भक्ति का शास्त्र यद्यपि दक्षिण में बना किन्तु उसका पूर्ण उत्कर्ष उत्तर में हुआ. भक्ति आंदोलन अखिल भारतीय था. भारत की सभी भाषाओँ और साहित्य पर भक्ति आंदोलन का प्रभाव है. अतः उसने भारत की सांस्कृतिक एकता को पुष्ट किया। हिंदी साहित्य में भक्ति काल दीर्घ व्यापी लगभग तीन शताब्दियों तक प्रभावी रहा. शायद ही किसी अन्य भारतीय भाषा में इतनी संख्या में श्रेष्ठ कवी - कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, जायसी जैसे हुए हों और साथ ही हिंदी भक्ति साहित्य में मुसलमान कवियों का उत्तम योगदान भी अन्यत्र नहीं मिलता.


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सहायक ग्रन्थ सूची :
हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२
http://gadyakosh.org/gk/हिन्दी_साहित्य_का_इतिहास_/_आचार्य_रामचंद्र_शुक्ल

Saturday, 17 December 2016

एक सराहनीय प्रयास

भारत में आजकल नोट बंदी चल रही है, ५०० और १००० रुपये के नोट भारतीय केंद्रीय सरकार ने वापस ले लिए हैं. इस समय मैं   स्वयं भी भारत में हूँ और नोट बंदी और बदलवाने के इस राष्ट्रीय पर्व का साक्षी हूँ. मैं भी यदा कदा बैंकों की पंक्तियों में खड़ा होकर आम भारतीय होने पर गर्व महसूस करता हूँ. यहाँ मुझे  अपने अन्य भारतीय भाइयों और बहनों की तरह ही कॅश लेने, नोट बदलवाने और जमा करवाने के लिए पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है. बड़ा ही सुन्दर  नज़ारा है.
वैसे तो  मैं जब भी भारत आता हूँ तो भारत के विकास की अनछुई और बिन कही तमाम बताओं को समझने  का प्रयास करता हूँ. जैसे स्वछ भारत में क्यों लोग, विशेषतः बच्चे, शहर के मुख्य बाजार चौराहों में आज भी मल-मूत्र करते दिखते हैं, सरकार की जन धन योजना होने पर भी मज़दूरों और किसानों की बैंक खतों में कुछ सौ रुपये ही दिखाई देते है. रेलवे के रिजर्वेशन काउंटर में बैठे कर्मचारियों को अपने ही काउंटर (संसद सदस्य, विधायक, विदेशी सैलानी आदि )के बारे मैं ठीक से जानकारी नहीं है.
 हाँ तो बात मैं नोट बंदी की कर रहा था, तो यह एक निश्चित रूप से सराहनीय प्रयास है परन्तु देखना दिलचस्प होगा कि इस तथाकथित लड़ाई में भ्रस्टाचार के शीर्ष पर बैठे हुए भारत के राज नेताओं का क्या होता क्योंकि शायद भारत की वर्तमान स्थिति के लिए राजनैतिक दलो का धन सञ्चालन (डोनेशन्स एंड कलेक्शन्स) ही सबसे पहले शक के दायरे में है. भारतीय जीवन की रोज की  जद्दोजहद में ऐसा लगता है कि हर भ्रष्ट नागरिक राजनीति के इस ब्लैक होल (काली सुरंग) को ही भरने के येन केन प्रकारेण  प्रयास में लगा हुआ है. सरकार के इस नोट बंदी के प्रयास से आपेक्षा रहेगी कि भारत की ईमानदार और कर्त्तव्य परायण जनता को एक बार फिर से भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीतिक जीवन के प्रति विश्वास जागे और उसका जीवन सुचारू रूप से चल सकेगा।
मैं कुछ दिनों में भारत से चला जाऊंगा परतु आशा है सरकार के इस सराहनीय प्रयास का आम आदमी के जीवन में जल्दी से जल्दी असर दिखाई देगा और निकट भविष्य में यह कॅश और भ्रस्टाचार की अर्थव्यवस्था पर अंकुश जरूर लगेगा।
कुछ समय पश्चात........
मेरे भारत से लौटने के बाद समाचार सुनायी देता है कि राजनैतिक दलो को पुराने ५०० और १००० के नोट जमा करने पर कोई पाबन्दी नहीं है तो फि र अब और क्या कहें इसके अलावा .......रामा-ओ-रामा .......   

Saturday, 18 June 2016

हिंदी साहित्य का इतिहास - III : भक्तिकाल १४००-१७०० - भाग एक

भाग एक 

भक्ति साहित्य का आधार भक्ति आंदोलन है, इसका अर्थ हुआ की भक्ति  साहित्य की एक वैचारिक भूमि थी. भक्ति आंदोलन की विशेषता यह बताई गयी है की इसमें धर्म साधना का नहीं वरन भावना का विषय बन गया था. महाराष्ट्र के संत नामदेव (जन्म सन् १२५६ ई) की रचनाओं से हिंदी में भक्ति साहित्य की प्रधान प्रवृति बनी रही. इस धार्मिक और साहित्यिक आंदोलन ने हिंदी को कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा जैसे कवि दिए. इनकी कवितायेँ इतनी लोकप्रिय एवं उत्तम हैं की भक्ति कल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है.

पं हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार भक्ति आंदोलन भारतीय चिंता-धारा का स्वाभाविक विकास है.नाथ सिद्धों की साधना, अवतारवाद, लीलावाद और जातिगत कठोरता, दक्षिण भारत से आई हुई धारा में घुल मिल गयी, ऐसा प्रतीत होता है. पं रामचन्द्र शुक्ल जी भी इसके ऐतिहासिक आधार पर टिप्पड़ी करते हुए कहते हैं कि दक्षिण भारत से आये हुए भक्ति मार्ग को उत्तर भारत ने बड़े ही  व्यापक रूप में अपना लिया था. 

शायद इसका कारण दक्षिण भारत की उस समय (१३वी शताब्दी एवं १४ वी शताब्दी ) की सामाजिक और ऐतिहासिक स्थितियां स्पष्ठ करती हैं जिसने अवर्णों एवंम स्त्रियों को सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से ऊपर उठने के लिए एक नया मार्ग ढूंढने की ओर प्रेरित किया, लेकिन यह काम किसी सुसंगत विचारधारा अथवा दर्शन के बिना नहीं हो सकता था. दर्शन के दो अंग होते हैं - तत्त्व बोध और उसी के अनुकूल उत्पन्न साधना मार्ग जिसे आजकल जीवन दर्शन कहते हैं. 

इस विषय में शंकराचार्य (जन्म सन् ७८८ ई) का अद्वैत और रामानुजाचार्य (जन्म सन् १०१७ ई) का विशिष्टाद्वैत को एक साथ देखना चाहिए। शंकराचार्य जगत को मिथ्या और ब्रह्म को विशेषण रहित। दूसरी ओर रामानुजाचार्य जगत को मिथ्या नहीं वरन वास्तविक मानते थे और ब्रह्म को विशेषणयुक्त। उनके अनुसार इस जगत को वास्तविक मानकर उसे महत्त्व देने में ही भक्ति की लोकोन्मुख्ता एवं करुणा है.  

भक्ति तो पहले भी थी परन्तु वह केवल साधना मात्र थी, आंदोलन नहीं. ऐतिहासिक स्थितियों की अनुकूलता में वह प्रवत्ति व्यापक एवं तीव्र होकर धार्मिक आंदोलन बन गयी. 

शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य के समय की ऐतिहासिक परिस्थियां भी इसी और चिन्हित करती हैं कि अवर्णों को सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से ऊपर उठाने की निसंदेह चेष्ठा की गयी थी.  दक्षिण भारत में पहली शताब्दी के बाद कई शताब्दियों तक राज सत्ता पराक्रमी शासकों के हाथ में रही. संगम काल में चोलवंशी शासक करिकाल ने कावेरी नदी के जल को नियंत्रित करके सिचाई के व्यवस्था की थी और एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी बनवाया था. कांचीपुरम पल्लवों की राजधानी थी, ७ वीं शताब्दी के अंतिम और ८ वीं शताब्दी के प्रारम्भ में पल्लब शासक नर्सिंग वर्मन ने स्थापत्य को अत्याधिक बढ़ावा दिया और उसने कांची का प्रसिद्ध राजसिंघेश्वर मंदिर बनवाया। उसके समय में चित्रकला की भी बहुत उन्नति हुई थी. इस सब से कांची में शिल्पियों को बहुत सम्मान मिला। मद्रास म्यूजियम के उत्तम चोला ताम्रपत्र के अनुसार कांची पुरम के बुनकरों को स्थनीय मंदिर की वित्तीय देखभाल का काम सौंपा गया था. इससे बुनकरों को व्यापारियों-वैश्यों जैसा ही सम्मान मिला। इसके अतिरिक्त आचार्य रामानुज का जन्म कांची पुरम के पास हुआ था, वे अधधयन के लिए बचपन में ही कांचीपुरम आ गए थे. वहां उनकी भेंट कांचीपूर्ण से हुए. कांचीपूर्ण रामानुजाचार्य के शूद्र गुरु थे. यह भी विदित है की प्रसिद्ध वैष्णव अलवार संत-कवि दक्षिण में ही थे, इन्ही में एक महिला 'अंदाल' भी थी और प्रसिद्ध अलवार नाम्म या शठकोप शुद्र थे.  

रामानुजाचार्य की ही परंपरा में रामानन्द (जन्म सन् १३०० ई के आस पास ) हुए जिनके बारे में कहा जाता है की वे भक्ति को दक्षिण से उत्तर में लाये।

जैसी स्थिति उत्तर भारत में १३ वीं  और १४ वीं शताब्दी में उत्पन्न हुए वह, जैसा ऊपर बताया गया है, दक्षिण में पहली शताब्दी के बाद ही पैदा हो गयी थी. इसी समय दिल्ली सल्तनत (१३ वीं) से मुस्लिम शासकों का शासन भी शुरू हो गया था और 16वीं शताब्दी में तो मुग़ल शासक तमाम खुनी लड़ाईयों के बाद पूर्णतया स्थापित हो गए थे. इसलिए शायद डॉ रामचद्र शुक्ल जी इसे इस्लामी आक्रमण से पराजित हिन्दू जनता की असहाय एवं निराश मनस्थिति से जोड़ा था. वे एक और इससे दक्षिण भारत से आया हुआ मानते थे, दूसरी ओर  यह भी मानते थे की अपने पौरुष से निराश-हताश जाति के लिए भगवान् की सकती और करुणा के ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था. हो सकता है शुक्ल जी इस उदासी और निराशा को भक्ति का कारण  न बता रहे हों वरन वे उत्तर भारत की हिन्दू जनता की उस मानसिकता को बता रहे हों जिसने दक्षिण भारत से आये हुए भक्ति मार्ग को इतने व्यापक रूप में अपना लिया था. 

हिंदी साहित्य के चारों कालों को देखने से पता चलता है की साहित्य के योगदान में अवर्णों और नारियो की सह स्थिति हैं. हिंदी में अवर्ण साहित्यकार अधिक संख्या में या तो भक्ति काल में हुए या फिर आधुनिक काल में. नारी रचनाकारों की भी कमोवेश यही स्थिति है.  

 अपने अगले भाग में हम भक्ति काल के सम्प्रदायों, कवियों और निर्गुण-सगुण  पर चर्चा करेंगे..... धन्यवाद

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सहायक ग्रन्थ सूची :
हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२
http://gadyakosh.org/gk/हिन्दी_साहित्य_का_इतिहास_/_आचार्य_रामचंद्र_शुक्ल


Thursday, 12 May 2016

सुनिए प्रधानमत्री जी

आज मैं बात करूँगा उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार की वापसी की. हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में बर्खास्त की गयी कांग्रेस की सरकार को वापस बहुमत साबित करने का मौका दे कर केंद्रीय सरकार की मंशा पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाया है और राष्ट्रपति शासन को हटा कर निर्वाचित सरकार को फिर से काम करने का मौका दिया. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय सराहनीय है. 

परन्तु क्या हो गया है मोदी सरकार को. मोदी सरकार तो ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस साफ़ के स्थान पर कांग्रेस की भांति कार्य करने पर उतारू है. यह तो एक किताबी संवैधानिक ज्ञान है की यदि थोड़ा भी प्रांतीय सरकार के बहुमत साबित करने की सम्भावना होती है तो एक जिम्मेदार केंद्रीय सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रांतीय सरकार तो बहुमत साबित करने का पूरा अवसर दे मगर मोदी सरकार तो लगता है की राष्ट्रपति शासन लगने की इतनी जल्दी थी की उसने उत्तराखंड सरकार को इसका मौका ही नहीं दिया और आनन फानन में राष्ट्रपति शासंन लगा दिया. अपने इस कृत्य से मोदी सरकार पर तानाशाही होने के आरोपों को बल मिलता है. लोकतंत्र जिम्मेदारी से चलता है न की मन मानी से. देश की कोटि कोटि जनता ने श्री मोदी जी को बहुत आशा और विशवास के साथ २०१४ के लोकसभा चुनाव में बहुमत दिया है इस विश्वास के साथ कि भारत माता  का यह बालक अपने जीवन के अनुभवों से देश के जनता का दुःख दर्द ज्यादा अच्छे तरीके से समझ कर उन्हें दूर करने में कोई कोर कसर नहीं रखेगा। इसलिए हमारे प्रधानमत्री मोदी जी का यह नैतिक दायित्व है कि वे जनता के इस भाव को अच्छे से समझे और उस दिशा में निरंतर कार्य करें अन्यथा ऐसा न हो क़ि जनता की कांग्रेस के विकल्प के तौर पर सरकार चुनने की इच्छा और अपेक्षा दोनों ही समाप्त हो जाये और पुनः कांग्रेस आने वाले कई वर्षों तक फिर सत्ता रूढ़ हो जाये और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना सपना ही रह जाये. और यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी के आपातकाल में गैर कांग्रेस सरकार का एक प्रयोग पहले ही असफल हो चूका है.  

यदि मोदी सरकार का यह अलोकतांत्रिक मंतव्य किसी  राजनैतिक अथवा अराजनैतिक सलाह का परिणाम है तो यह जिम्मेदारी भी प्रधानमत्री महोदय की है को वे अपने सलाकारों पर नियंत्रण रखें और स्वस्थ लोकतंत्र का पाठ याद दिलाएं कि लोकत्रंत्र में नर ही नारायण होना चाहिए और उसके हेतु ही सारी योजनाएं केंद्रित रहनी चाहिए। 

भारत बहुत बड़ा और विकट भिन्नताओं वाला देश है और इसकी आवश्यकताएँ भी असीमित है. कुछ भारतमाता की संतानें गरीबी के चरम पर जीवन यापन करने को विवश है, कुछ नौजवान बेरोजगारी से ग्रसित हैं, बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और उस पर शिक्षा, स्वास्थ, सूखा, बाढ़, आपदा, सामान्य जीवन हेतु अत्यन्त अल्प आवश्यकताओं हेतु भारत माता की संतानें प्रतिदिन संघर्ष करती है. और उसके ऊपर कुछ लोग तो हर पल भारत माता को कलंकित और आहत करने को तत्पर हैं. 

ऐसे में प्रधानमत्री जी यदि इन समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ण सामर्थ्य और क्षमता से कार्य करें तो ही निसंदेह वे भाजपा के "चाल चरित्र और चेहरा" वाले नारे को चरितार्थ कर पाएंगे अन्यथा यह नारा नारा ही रह जायेगा और भारत माता को एक बार फिर निराशा ही हाथ लगेगी।  

Saturday, 22 August 2015

नेट नूट्रलिटी

आज कल नेट नूट्रलिटी अर्थात इंटरनेट निरपेक्षता पर विश्व भर में चर्चा हो रही है तो सोचा की चलिए इस पर भी कुछ विचार रखे जाएँ.

सबसे पहले, क्या है यह इंटरनेट निरपेक्षता, यह एक प्रकार की कंप्यूटर शब्दावली है जिसमे इंटरनेट की सुविधा देने वाली कंपनी या कम्पनिओं से यह अपेक्षा रहती है की वह अपने अपने ग्राहकों को निरपेक्ष सुविधा दें. 
इसका मतलब यह हुआ की उनके रूट (इंटरनेट मार्ग) से जो भी वेब साइट्स उनके ग्राहकों द्वारा देखी जाएँ उनमे किसी तरह का कोई पक्षपात न हो.

यह पक्षपात कई रूप में हो सकता है. जैसे, कुछ इंटरनेट कंपनियां कुछ विशेष प्रकार के उत्पादों को ज्यादा जल्दी अपने ग्राहकों को उपलब्ध करा सकती है जबकि कुछ दूसरे (जो इस इंटरनेट कंपनी को पसंद न हों) उत्पादों को उपलब्ध करने में देरी कर सकती हैं. दूसरा उदाहरण यह हो सकता है की आप कोई संगीत सुनना चाहते हैं परन्तु आपका इंटरनेट उपलध कराने वाली कंपनी (इंटरनेट प्रोवाइडर) उस संगीत को आपके उपकरण में धीरे धीरे उपलब्ध  कराये और जिसका परिणाम यह हो कि ज्यादा समय लेने के कारण या तो आप उस संगीत को अपने उपकरण में ले ही ना और या फिर आपको ज्यादा मूल्य देना पड़े अपने उपकरण में वह संगीत लेने के लिए.   


अब यह समस्या क्यों हुई इसका शायद उत्तर है इंटरनेट कि निरत बदलती तकनीक और इंटरनेट उपलब्ध करने वाली कम्पनिओं का लालच . ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इंटरनेट कि बढ़ती हुई तकनीक ने इंटरनेट को अब और अधिक तेज़ और उपभोक्ता कि प्राथमिकताथमिकता अनूरूप मॉडल बना दिया है. इसका अर्थ यह हुआ कि अब इंटरनेट मोबाइल कम्पनिओं द्वारा भी उपलब्ध कार्य जा रहा है. इन मोबाइल फ़ोन कम्पनिओं ने अपनी त्वरित मेसेजिंग सिस्टम से काफी पैसा बनाया है. परन्तु आप ऐसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर आ गए हैं कि त्वरित मेसेजिंग सिस्टम कि उपयोगिता लगभग ख़त्म सी हो गयी है. ऐसे कंप्यूटर सोफ्ट्वरों में स्काइप और व्हाट्सप्प जैसे सॉफ्टवेयर भी हैं जो यदि आपके पास इंटरनेट कि सुविधा हो तो यह सॉफ्टवेयर आपको आसानी से मुफ्त फ़ोन पर बात करने कि सुविधा देते हैं. इससे टेक्नोलॉजी कि दुनिया में.वौइस् ओवर आईपी कहा जाता है. अब समस्या यह होगई मुख्यतौर पर मोबाइल फ़ोन कम्पनिओं के लिए कि उनकी त्वरित मेसेजिंग सिस्टम की उपयोगिता खत्म हो गयी और लोग उनके द्वारा दी गयी इंटरनेट की सुविधा से मुफ्त में फ़ोन पर बात कर लेते हैं. और यहीं से शुरू होता है लालच और हाई टेक्नोलॉजी का मत विभाजन और कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट.

इन कंपनियों ने अब अपने ग्राहकों द्वारा दूसरी उपयोगी सुविधाओं के लिए इंटरनेट को धीमा करना शुरू कर दिया और ऐसे हर इंटरनेट मार्ग को निम्न प्राथमिकता में रखना शुरू कर दिया जिससे उनको आय नहीं होती है, इंटरनेट सुविधा देने की आय के ऊपर. इंटरनेट सुविधा देने की आय तो वे पहले ही या तो मासिक अनुबंध द्वारा अथवा एक मुश्त फ़ोन के मूल्य से निकाल लेते हैं. अपने इसी लालच के कारण वे अब अपनी प्रतियोगी कम्पनिओं के इंटरनेट मार्ग को व्यस्त रखते हैं और आपको इंटरनेट की धीमे गति मिलती है.     

स्वस्थ व्यवसाइक वातावरण तो यह होता है कि सभी कम्पनिओं को अपने अपने उत्पाद दिखाने के लिए बराबर समय   मिलना चाहिए और वह भी सामान गति से जिससे ग्राहक स्वयं यह निर्णय कर सके की उससे किस उत्पाद में ज्यादा रूचि है ना कि ग्राहकों पर परोक्ष रूप से वह ही परसा जाये जो व्यवसाइक दृस्टि से ही अधिक आय अर्जित कर सके. 

Saturday, 4 April 2015

हिंदी साहित्य का इतिहास - II : आदिकाल १०००-१४००

आज हिंदी साहित्य के लेख को आगे बढ़ाते हैं. आज हम अपने पूर्व के लेखानुसार हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों का विश्लेषण करेंगे. आज का लेख आदि काल को समर्पित है. 

आदिकाल १०००-१४०० 
यह विविध और परस्पर विरोधी प्रवर्तियों का काल है. राजनैतिक दृष्टि से उत्तरी भारत छोटे छोटे राज्यों में बंटा हुआ था. हर्षवर्धन (लगभग ६०६-६४७) के बाद किसी ने केंद्रीय सत्ता स्थापित नहीं की. आवागमन के साधनों के अविकसित होने के कारण विभिन्न स्थानों पर रची गयी कृतियों में भाषागत विभिन्नताओं और क्षेत्रीयता का रंग अधिक है. इसलिए आदिकाल का साहित्य अनेक बोलियों का साहित्य प्रतीत होता है. धार्मिक दृष्टि से इस काल में अनेक ज्ञात और अज्ञात साधनाएं प्रचलित थीं. सिद्ध, जैन, नाथ, आदि मतों का इस काल में व्यापक प्रचार था. सिद्धों का सम्बन्ध बौद्ध धर्म की कालांतर की तंत्र मंत्र की साधना, अर्थात वज्रयान, से था. इन्होने सहज जीवन पर बल दिया और वर्णाश्रम व्यवस्था पर तीव्र प्रहार किया है. सिद्धों का स्थान मध्य देश का पूर्वी भाग है. नाथों नें भी 'जोई जोई पिण्डे सोई ब्रह्मांडा' अर्थात जो शरीर में है वही ब्रह्माण्ड मैं है, कह कर ब्रह्मचर्य, वाक् संयम, शारीरिक- मानसिक सुचिता, मद्य-मांस के त्याग पर जोर दिया है.  नाथों का स्थान मध्य प्रदेश  का पश्चिमोत्तर भाग बताया जाता है.  जैन मतावलम्बी रचनाएँ दो प्रकार की हैं, पहली, नाथ-सिद्धों के तरह उपदेश, नीति और सदाचार पर बल है और दूसरी, पौराणिक, जैन साधकों की प्रेरक जीवन कथाएं और लोक प्रचलित कथाओं को आधार बना कर जैन मत का प्रचार किया गया लगता है.  जैन मत के प्रभाव में अधिकांश काव्य गुजरात, राजस्थान और दक्षिण में रचा गया है. 
इसके अतिरिक्त, पंडित रामचंद शुक्ल जी ने आदिकाल के तीसरे चरण को वीरगाथा काल  भी कहा है जिसमे श्रृंगार परक लौकिक काव्यों के साथ साथ कवि अपने आश्रय दाताओं और उनके पूर्वजों के पराक्रम , रूप और दान इत्यादि की प्रशंसा करते थे. इस काल में भूमि और नारी का हरण राजाओं पैर लिखे गए काव्य का सामान्य विषय है.पृथ्वी राज रासो, प्रसिद्ध चन्दरवरदायी की रचना, इस काल का एक महत्वपूर्ण काव्य है. भाषा की दृष्टि से यह अपभ्रंश और हिंदी का संधिकाल रहा है. आदिकाल का साहित्य शुद्ध अपभ्रंश अथवा शुद्ध हिंदी का न होकर अपभ्रंश-हिंदी का साहित्य है. साथ ही इस्लाम का भी प्रवेश हो चुका था और इसका भी प्रभाव आदिकाल के अंतिम चरण के प्रसिद्ध कवि अमीरखुसरो में दिखाई देता है. आदिकाल समाप्त होते होते दिल्ली के सिंहासन पर अलाउद्दीन ख़िलजी (लगभग १२९६-१३१६) जैसा शासक दिखाई देता है जो मध्य देश ही नहीं लगभग समूचे देश में अपना शासन स्थापित करता है. 

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हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२

Wednesday, 4 February 2015

दिल्ली दरबार

आज फिर कुछ लिखने का मन कर रहा तो आज कल दिल्ली, भारत में चल रहे चुनावी दंगल की बात हो जाये. एक तरफ जहाँ भारत के प्रधान मंत्री की साख दाँव पर है तो दूसरी तरफ भारत की राजनीती में एक उभरते हुए व्यक्तित्व की विश्वसनीयता का प्रश्न है

दोनों तरफ ही राष्ट्रवाद और राजनैतिक सुधारवाद का बोलबाला है और दोनों ही पक्ष अपने अपने नेता के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध और विश्वस्त नज़रें आ रहे हैं.

परन्तु ऐसा लगता है की कुछ तो बात है जो प्रधान मंत्री जी की पार्टी को असमंजस मैं डाले हुए है. ऐसा में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस लेख के लिखे जाने तक प्रधान मत्री जी दिल्ली नगर में करीब ३ रैलियां सम्भोधित कर चुके हैं जो उनके कद के नेता के लिए बहुत ज्यादा है. याद कीजिये २०१४ के आम चुनाव की, प्रधान मत्री जी की एक चुनावी सभा उस पूरी डिस्ट्रिक्ट और कभी कभी पूरे राज्य विशेष के लिए पर्याप्त होती थी तो यहां क्या बात है की प्रधान मंत्री जी अभी कुछ और दिल्ली में आम सभाओं को संम्बोधित करने का मन बना रहे हैं. और इसके ऊपर, यदि खबरों की सुने, तो भाजपा ने अपने करीब १५० क्षेत्रीय और राष्ट्रीय नेताओं की फ़ौज लगा दी है चुनाव प्रचार में. उसके भी ऊपर भाजपा नें अपने कैडर के नेताओं पर विशवास न करके एक बाहरी उम्मीदवार श्रीमती किरण बेदी को मुख्य मंत्री के रूप में मैदान में लाना पड़ा.

यह सब कुछ करने के बाद भी भाजपा के शीर्ष नेता अपनी जीत तो सुनिश्चित बताने में हिचक ही रहें हैं.

दूसरी तरफ भी देश भक्ति और भ्रस्टाचार जैस ज्वलंत मुद्दों पर राजनीती का खाता खोलने वालों का आत्मा विशवास भी डोला हुआ दिख रहा है. बार बार ४९ दिनों में सरकार गिरा देने का प्रश्चाताप जनता के बीच में अपनी खोई हुई विश्वसनीयता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास ही लगता है. और उसके ऊपर से निरंतर साथ छोड़ते हुए पुराने साथी भी उनकी पार्टी के लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हैं. और आप पार्टी के नेता के अतिरिक्त कोई भी प्रभावशाली व्यक्तित्व का अभाव भी उनकी प्रशाशनिक क्षमताओं पर भी प्रश्नचिन्ह ही लगाता है.

काँग्रेस का तो सूपड़ा ही जैसे साफ़ दिखाई देता है. प्रभावशाली नेतृत्व क्षमताओं के रहते हुए भी उनकी विश्वनीयता आम जनता में गंभीरता रूप से सशंकित ही है और लगता है जैसे २०१४ के आम चुनाओ की ही भांति कांग्रेस पार्टी को मायूस ही होना पड़ेगा और ऐसा हाल फिलहाल में कराये गए सर्वेक्षणों से भी लगता है. परन्तु शायद अपनी इस स्थिति के लिए स्वयं काँग्रेस खुद ही जिम्मेदार है.

इसप्रकार से सभी पार्टियां कुछ भी अपने बारे में निश्चितता से नहीं कह सकती है कि चुनाओ के परिणाम उनके पक्ष में आएंगे या नहीं. परन्तु याद कीजिये ऐसा अभी कुछ महीन पहले ही हुए आम चुनाव में नहीं था और भाजपा मदमस्त हाथी की भांति विजय विजय का राग आलाप रही थी और जनता नें उसे सत्ता में आने का मौका भी दे दिया । और उसके साथ २-३ विधान सभा चुनाव में भी विजय दिलवाई।

ऐसा दिल्ली के चुनाओ मैं नहीं कहा जा सकता क्योंकि यही तो शायद लोकशाही की सुंदरता है की कुछ भी अनुमान लगा लीजिये परन्तु परिणाम जनता अपने विवेक से उचित समय पर उचित ही लेती रही है, वह चाहे इमरजेंसी के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी को उखाड़ फेकना हो या फिर मंडल कमंडल की चौकड़ी की सत्ता में पुनः वापसी ना करने देना हो.

अब प्रश्न यह उठता है की फिर किसको सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए, वैसे तो सबसे बड़ी दावेदारी, मेरी समझ में, आप पार्टी को है और इसका कारण भी है. कारण यह है कि भाजपा को काफी राज्यों में सरकार चलाने का अवसर मिल चुका है और उनके पास भाजपा शाशित राज्यों में जन कल्याण के कार्यक्रम चला सकते हैं और देश भक्ति और सुशासन का प्रमाण देने का अवसर है . दूसरी तरफ आप पार्टी को अभी तक पूरा अजमाना बाकी है, वे या तो ४९ दिनों मैं सरकार की जिम्मेदारिओं से भाग गए या फिर आम चुनाओ में पर्याप्त संख्या न प्राप्त कर सके.

और एक स्वस्थ लोक तांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और भाजपा इस भूमिका को वर्तमान परिस्थिओं में सबसे अछे तरीके से निभा सकती है क्योकि उसकी. केंद्र में सरकार है और राज्य सरकार के गलतियों को जनता के सामने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ला सकती है.

अब रही बात कांग्रेस की तो अभी उसे थोड़ा सत्ता से बाहर रह कर आंदोलन का अभ्यास करना चाहिए और विधान सभी के अंदर और बाहर एक सकारात्मकता के साथ काम करते हुए सरकार और विपक्ष की विफलताओं को जनता के बीच में लाना चाहिए जिससे दिल्ली को भाजपा और आप दोनों के ही विकल्प के रूप में एक तीसरी राजनैतिक शक्ति मिल सके.

Monday, 8 April 2013

हिंदी भाषा का इतिहास : हिंदी साहित्य का काल विभाजन - I

 आज हम हिंदी साहित्य के इतिहास पर चर्चा करेंगे। हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारंभ संभवतः तब हुआ होगा जब हिंदी में रचनाएँ प्रारंभ हुई होंगी। भाषा का प्रवाह धारा के प्रवाह की भांति नहीं होता और ठोस वस्तुओं की तरह उसका विभाजन संभव नहीं है। परन्तु फिर भी विद्वान मानते हैं की हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पूर्व मिलने लगता है। हिंदी साहित्य के इतिहास का विभाजन कालक्रम की दृष्टी से चार कालों - आदि, पूर्वमध्य, उत्तरमध्य और आधुनिक में किया जाता है।

पंडित रामचंद्र शुक्ल ने काल क्रम से विभाजित इस काल खंडो का नामकरण इसप्रकार किया है - आदिकाल को अपभ्रंश काव्य और देश भाषा काव्य में विभाजित करके देश भाषा काव्य को 'वीरगाथा' नाम दिया। अपभ्रंश काल में जैन, सिद्धों और नाथ कवियों द्वारा लिखित सामग्री को वे साहित्य की कोटि में रखने को तेंयार नहीं थे। उनके अनुसार देश भाषा काव्य की वीरगाथात्मता ही समूचे आदिकाल की प्रधान साहित्यिक प्रवृति हैं। इसलिए वि आदिकाल को 'वीरगाथाकाल' कहना उचित समझते थे। पूर्वमध्य काल को वे 'भक्तिकाल' और उत्तम काल को वे 'रीतिकाल' कहते हैं। आधुनिक काल को वे 'ग़द्दकाल' कहना उचित समझते हैं। शुक्ल जी द्वारा किया गया हिंदी साहित्य के इतिहास का नाम करण और काल विभाजन इस प्रकार से है,

आदिकाल   - संवत १०५० से १३७५
पूर्वमध्य काल (भक्तिकाल)  - संवत १३७५ से १७००
उत्तम काल (रीतिकाल) - संवत १७०० से १९००
आधुनिक काल (ग़द्दकाल) - संवत १९०० से ........

अपने आगे की श्रंखला में हम एक एक करके इन कालों की विवेचना करेंगे।
तब तक के लिए आज्ञा  दीजिये। धन्यवाद

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हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२

Saturday, 1 December 2012

एक विचार

वर्ष 2012 समाप्त होने को है और मैं एक बहुत ही लम्बे समय के पश्चात अपने इस प्रिय ब्लॉग पर लौट सका हूँ। कुछ व्यस्तताओं और निजी अस्वस्थथा होने के कारण यह विलंभ हुआ, आशा है आप लोग क्षमा करेंगे।
कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ की कहाँ से शुरू करूँ। कहावत है की शुरुवात अच्छे से ही करनी चाहिए तो अभी कुछ दिन पहले ही समाचार आया है कि ब्रिटेन के भारतीय मूल के बड़े व्यवसायी श्री लक्ष्मी मित्तल और फ्रांस सरकार में समझोता होगया है कि श्री मित्तल अब अपना फ्लोरंगे साईट की स्टील फैक्ट्री नहीं बंद करेंगे जिससे लगभग 650 फ्रांस के लोग बेरोजगारी के खतरे से बच गए और इस प्रकार से विश्व ने देखा की किस प्रकार से भारतीय भी जन हित को ध्यान में रख कर व्यवसायिक योजनायें बनाने में सक्षम हैं। इसी के साथ कुछ समय पहले यह समाचार भी सुखदायी थे कि अग्नि V के प्रक्षेपण के साथ ही भारत भी विश्व की 6 बड़ी सामरिक शक्तियों के समूह में  शामिल हो गया है। इसी के साथ भारत के पास भी अब 8000 किलोमीटर लम्बी दूर मार करने वाली प्रक्षेपात्र उपलब्ध है।
ख़राब समाचरों में भारत देश में भ्रटाचार एक बहुत बड़ी बीमारी के रूप में साफ़ दिखाई दिया है जहाँ इतने बड़े बड़े घोटाले सुनायी दे रहे हैं की एक आम भारतीय तो शायद कभी ठीक से पैसे की उस मात्रा और उनकी पूरी गिनती भी न कर पाए। परन्तु जैसे गुलामी के अँधेरे में राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी और अन्य महा पुरुष सक्रिय थे और वे सफल भी हुए उसी प्रकार से आज भी हमारे सामने इस भ्रटाचार रुपी राक्षस से लड़ने के लिए भी नायक उपलब्ध हैं। हम सभी को मिलकर उनके सफल होने की कामना करनी चाहिए। 
आज के लिए बस इतना ही, शेष फिर। जल्दी ही कुछ उपयोगी लेख के साथ उपस्थित होऊंगा। धन्यवाद ।

Tuesday, 22 November 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - X : हिंदी भाषा और उसकी शब्दावली

हिंदी भाषा अंग्रेजी भाषा से कई मायनों में भिन्न है.
इसीलिए मैं किसी को इंग्लिश से हिंदी सीखने की सलाह नहीं देता हूँ. कुछ उल्खेनीय तुलनाएं हिंदी और अंग्रेजी भाषा के प्रयोग की....... 

(१) हिंदी संज्ञाएँ (noun ) या तो पुर्लिंग हैं या फिर स्त्रीलिंग. जैसे "कमला" स्त्रीलिंग है और "मोहन" पुर्लिंग है
(२) अधिकतर विशेषताएं (adjectives ) लिंग के साथ बदलती रहती हैं. उद्धरण के लिए "कमला सुन्दर दिखती है " और "मोहन मोटा लगता है" इत्यादि.
(३) क्रिया (verb ) भी बदलती है लिंक के साथ जैसे "कमला खाती है" और "मोहन पढ़ रहा है".
( ४) पूर्वसर्ग (preposition) जैसे "है", "था" इत्यादि संज्ञा/सर्वनाम के बाद में आते हैं जबकि अंग्रेजी में पूर्वसर्ग संज्ञा के पहले आते हैं. जैसे अंग्रेजी में हम कहते हैं की "Mohan is reading" लेकिन हिंदी में हम कहते हैं "मोहन पढ़ रहा है". अर्थात संज्ञा/सर्वनाम और क्रिया/विशेषण के संयुक्त प्रयोग में भी हिंदी का प्रयोग अंग्रेजी के प्रयोग से भिन्न है.
(५) अंग्रेजी में एक ही संबोधन कई लोगों के लिए किया जा सकता है. जैसे "you" का प्रयोग अंग्रेजी में बड़े और अपने से छोटे सभी के लिए उपयोग होता है, परन्तु हिंदी में अपने से बड़ो अथवा सम्मान में "आप" का और मित्रवत संबोधन में "तुम" का प्रयोग होता है.
(६) बहुत से शब्द इंग्लिश ने हिंदी से लिए हैं और इन्हें बुधिजीविओं ने स्वीकार भी है. जैसे
बाज़ार,  बंगला, कुली, गुरु, खाकी,  ठग, लूट, पैजामा,  योग और पंडित इत्यादि

Sunday, 23 October 2011

पांचवी कक्षा दिनांक २३ अक्टूबर २०११

आज की कक्षा पुनः मैंने ली और हमेशा की भांति एकात्मता मंत्र के साथ कक्षा का आरम्भ किया.
कक्षा का आरम्भ "मेरा नाम क्या है " जैसे वाक्य से की गयी. बच्चों को बड़ा अच्छा लगा अपना अपना नाम बताने में. आपको याद होगा की हमने अपनी तृतीय कक्षा में बच्चों को घर पर इस वाक्य का अभ्यास करके आने को कहा था और जैसा मेरा अनुमान था की जिन बच्चों ने अभ्यास किया था उनकी समझ में तो आया परन्तु शायद उन बच्चों को जरूर बोरियत हुई होगी जो या तो उस कक्षा में नहीं थे या फिर अभ्यास नहीं कर पाए.
परन्तु शायद इसीलिए कक्षा में अध्यापकों की आवश्यकता है की वे पुनः अभ्यास कराएँ. और वैसा ही हम ने भी किया. एक बार फिर से बच्चों को वाक्यों की रचना करना सिखाया और उसके बीच बीच में शब्दों की रचना का भी अभ्यास किया. इसके पश्च्यात हम लोगों ने कुछ वाक्यों को लिखने का भी अभ्यास किया. यह वाक्यों की रचना हम आगे भी जारी रखेंगे और हमारी कोशिश रहेगी की इन वाक्यों से कुछ अर्थपूर्ण नैतिक ज्ञान बच्चों को इस सत्र की अंत, यानी कि जनवरी माह तक  सिखा सकें.
इस प्रकार से हमने अभी तक इतना तो कर ही लिया है....
                        एकात्मता मंत्र और गायत्री मंत्र का अभ्यास
                        वर्णाक्षरों का अभ्यास और दो-तीन अक्षरों से बनाने वाले शब्दों की रचना
                        हिंदी वाक्यों की रचना और पूर्ण विराम का परिचय;
                        संज्ञा और सर्वनाम

अपनी अगली कक्षा में हम संज्ञा और सर्वनाम का पुनः अभ्यास करेंगे और हिंदी भाषा के कुछ अन्य पहलू पढेगे. हमारी सहयोगी रीता जी ने कुछ सूचनाएं बच्चों को दी हैं. जैसे दीपावली के शुभ अवसर पर हमारी हिंदी कक्षा अगले सप्ताहांत नहीं लगेगी और अगली हिंदी कक्षा अब ६ नवम्बर को होगी.
आज कुछ नए बच्चे भी कक्षा में दिखे और सभी ने बड़े ख़ुशी के साथ कक्षा में भाग लिया. हिंदी कक्षा के अपने इस सत्र में हम लोग हिंदी - एक बोल चाल की भाषा के रूप में ले रहे हैं और इसलिए बच्चों को कक्षा में बहुत नहीं लिखना होता है.बच्चे इससे बहुत खुश हैं और एक बच्ची ने तो कहा की "पहले हम बहुत लिखते थे और अब बहुत पढ़ते हैं".अब अगली कक्षा, याद रहे जो ०६ नवम्बर को है, की जिम्मेदारी रीता जी की है.
सभी को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं.
शेष फिर.अपने विचार भेजते रहें. धन्यवाद 

एक विचार

कुछ समय पहले भारत का एक समाचार सुना की क्रिकेट की दुनिया के सितारे श्री सचिन तेंदुलकर अपने नए घर में शिफ्ट हो गए. बहुत अच्छा लगा कि श्री सचिन ने अन्य भारतीय बंधुओं कि ही भांति अपना घर पा लिया और इसके लिए उन्हें शत शत बधाई.
परन्तु बिना किसी किन्तु-परन्तु के मैं अपना कोई भी लेख नहीं लिख सकता और यहाँ पर भी मुझे सामंतवादी मानसिकता की बू सी आ रही है. हम भारतीय आज भी इन्हीं समाचाओं में रूचि लेते हैं कि दुनिया के एक विकास शील देश के कुछ नागरिक, या यूँ कहें कि कुछ ख़ास नागरिक, जब अपनी महत्वकान्शाओं का प्रदर्शन करते है तो हम सभी,  पत्रकार बंधू भी, उसे बड़ा चढ़ा कर दिखा करके देश  कि गरीब और ६० साल के आज़ादी की लूट में अपने को ढगा हुआ महसूस करवाते हैं. वो चाहे बोलीवूड  के सितारे हों या फिर खेल और व्यवसाय से जुड़े हुए विशेष नागरिक. यदा कदा उनके व्यर्थ के धन प्रदर्शन का समाचार सुनने को मिल ही जाता है.
इसे एक दुर्भाग्य ही कहें की हमें यह सुनने को नहीं मिलता कि अभी कुछ समय पहले ही यूरोप के कुछ पूंजी पतियों ने यहाँ की सरकारों से यह निवेदन किया था कि उनका आय कर ज्यादा कर दिया जाये ताकि वे आर्थिक संकट से जूझ रहे अपने देश  कि सेवा  कर सकें. हम उससे कुछ शिक्षा ही लेने का प्रयास करें.
हमारे पत्रकार बंधुओं को क्या समाचाओं का इतना अकाल पड़ गया है कि जब तब वे इस प्रकार के समाचारों से देश की गरीब और दुखी मानस को और दुःख देते हैं और उन्हें उनके अपने ही अस्तित्व पर ही प्रश्न मार्क लगाने के लिए विवश करते हैं. साथ ही मैं बड़ी ही विनम्रता से पूछना चाहता हूँ कि क्या इन ख़ास नागरिकों को भारत की गरीबी दिखायी नहीं देती या फिर यह अपनी ऑंखें उस शुतुरमुर्ग की तरह बंद रखते हैं जो सुब कुछ होते हुए भी कुछ देखना नहीं चाहता है?

आंखिर इस संसार में एक मनुष्य को अपने परिवार के साथ रहने के लिए कितना स्थान चाहिए ?
यह  प्रश्न  मैं  आपके  लिए  छोड़े  जाता  हूँ परन्तु याद रहे की एक सादे अनुमान के अनुसार भारत के १२० करोड़ भाईओं, बहनों और बच्चों में से लगभग आज भी ४० प्रतिशत लोग गरीबी में रहने को विवश हैं.

Monday, 10 October 2011

तृतीय कक्षा : ०९ अक्टूबर २०११

नमस्ते, अपनी दूसरी और तीसरी कक्षा से हम लोगों ने विधिवत कक्षा शुरू कर दी है. अपनी इस कक्षा की जिम्मेदारी मेरी थे और मैंने कक्षा का प्रारंभ एकात्मता मंत्र के अभ्यास और कक्षा का समापन गायत्री महामंत्र से करवाया.
हिंदी में आज सभी बच्चों ने हिंदी वर्णमाला का मिलकर ऊँची आवाज में उच्चारण किया, फिर दो और तीन वर्णों को मिला कर शब्दों को बनाने का अभ्यास करवाया गया जैसे  जल , फल , कलम , कदम   इत्यादि  अंत में उन शब्दों को मिला कर अपना परिचय करना सिखाया गया.  बच्चों को गृह कार्य एक वाक्य पूरा (अपने परिचय का) लिख कर लाने को कहा गया है जैसे "मेरा नाम अनुराग है" . और हाँ अभिभावकों को गृह कार्य करने में कोई मद्दत नहीं करनी है बल्कि वे केवल बच्चों को गृह कार्य करने हेतु प्रेरित कर सकते हैं. विशेष बात यह रही कि आज बच्चों ने सब मौखिक अभ्यास किया और कुछ भी उन्हें लिखने कि आवश्यकता नहीं थी.  अपनी अगली कक्षा में हम वर्ण, शब्द और वाक्यों का ही मौखिक अभ्यास करेंगे.
और आज की सूचना में बच्चों से पूछा गया है कि वे अपने अभिभावकों से अनुमति ले कर आये यदि वे दीपावली उत्सव में भाग लेना चाहते हैं. आपकी जानकारी के लिए अपनी हिंदी कक्षा इस बार दीपावली पर कुछ कार्यक्रम में भाग लेने की सोच रही है सब कुछ निर्भर करेगे अभिभावक बच्चों को कितना प्रोत्साहित करते हैं..
अपनी अगली कक्षा की जिम्मेदारी नीता जी की है और आशा है बच्चों इन कक्षाओं का आनंद ले रहे होंगे. कृपया अपने सुझाव देते रहें. धन्यवाद

Sunday, 25 September 2011

प्रथम हिंदी कक्षा - शीत कालीन सत्र २०११

स्कूल्स में गर्मी की छुट्टियों की समाप्ति के साथ ही आज से हिंदी कक्षाएं पुनः शुरू हो गयीं. इस वर्ष अपनी इस कक्षा में हम लोग एक नया मंत्र 'एकात्मता मंत्र' सीखेंगे. और इसे एक प्रार्थना की तरह हर कक्षा के शुरू में अभ्यास करेंगे. मैं यहाँ पर , इस ब्लॉग पर, मंत्र और उसका अर्थ भी लिख रहा हूँ, यदि आप चाहें तो इसकी एक कॉपी प्रिंट कर सकते हैं.

यह सत्र लगभग दिसम्बर में क्रिसमस अथवा जनवरी प्रथम सप्ताह तक चलने का अनुमान है. अपने इस नए सत्र में हम उसी समय सारणी का अनुसरण करेंगे जो हमने अपने ब्लॉग में पहले प्रकाशित कर रखा है [प्रथम और दूसरी कक्षा : २०११ फरवरी माह (प्राथमिक-परिचय समय सारणी) ]. उसके अनुसार आज और अगले सप्ताह हम पुनः अभ्यास करेंगे और देखेंगे की बच्चों को कितना आता है ताकि आगे की कक्षाओं का विषय विस्तार तय कर सकें. इस सत्र में हम लोग बोल चाल की हिंदी भाषा पर ध्यान देंगे और कोशिश करेंगे की बच्चे हिंदी बोलने में संकोच न करें.

आज हमारी एक सहयोगी अध्यापिका रीता जी ने बच्चों को बड़े ही सुन्दर ढंग से हिंदी वर्णमाला के अक्षरों, रंग, विभिन्न पशु पक्षियों के बारे में पूर्ण अभ्यास कराया. शरीर के विभिन्न अंगों पर बना एक सुन्दर गीत भी बच्चों ने सुनाया. मैंने एकता मंत्र का बच्चों को अभ्यास कराया. इसी के साथ बच्चों ने गायत्री मन्त्र का भी उत्तम उच्चारण किया.बच्चों की संख्या लगभग १३ हो गयी थी.

बच्चों के अभ्यास को देखकर लगा की बच्चों ने कुछ तो सीखा ही है और वे हिंदी का उच्चारण करने में बहुत उत्साहित हैं. परन्तु अभी उन्हें बहुत कुछ सीखना है जिससे उनमे हिंदी के प्रति आत्म विश्वास आ सके और वे और अच्छी तरह से हिंदी में वार्तालाप कर सकें. परन्तु यह कार्य तो हम शिक्षक गणों का है और मुझे पूरा विश्वास है हम सभी अभिभावकों सहित यदि मिल कर प्रयास करेंगे तो यह बहुत कठिन कार्य नहीं है.

अपने अगले सत्र में पुनः एकता मंत्र के बाद हम लोग अभ्यास करेंगे और यथा संभव उसके बाद नए विषयों पर चर्चा शुरू करेंगे. बच्चों से घर पर हिंदी में वार्ता लाप करते रहें. याद रहे आपका यह प्रयास आपके बच्चों के लाभ के लिए है. कक्षा पर हमारा अगला अपडेट शीघ्र ही उपलब्ध होगा परन्तु यदि आप हमसे संपर्क करना चाहें तो आप ईमेल (bvmcardiff@yahoo.com) करें.
सारांश में हिंदी वर्ण माला ...............
    स्वर
              अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, अं, अ:
    व्यंजन
              क, ख, ग, घ, ड़         (कवर्ग)
              च, छ, ज, झ, ञ        (चवर्ग )
              ट, ठ, ड, ढ, ण         (टवर्ग )
              त, थ, द, ध, न        (तवर्ग )
              प, फ, ब, भ, म        (पवर्ग )
              य, र, ल, व       
              श, ष, स, ह
              क्ष, त्र, ज्ञ 

अभ्यास हेतु इन्टरनेट की उपयोगी वेबसाइट
    http://www.hindigym .com, http://indif.com
    http://www.hindilearner.com/hindi_resources.php
    http://www.geeta-kavita.com/ और
    http://www.shabdkosh.com 


Friday, 26 August 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - IX : हिंदी भाषा का अंतर राष्ट्रीय परिपेक्ष

भोगौलिक दृष्टीकोण से हिंदी बोलने वाले सारे विश्व में मिलते हैं और इसीलिए ४ वर्ष में एक बार विश्व हिंदी सम्मेलन होता है. अभी तक हुए हिंदी सम्मेलन विश्व के अनेक शहरों जैसे नागपुर, दिल्ली, पोर्ट लोइस (मौरिशियस), लन्दन, सूरीनाम इत्यादि में हो चुके हैं. इसकी महत्ता को पहचानते हुए ही तो यूनाइटेड नेशन ने आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन अपने न्यूयोर्क ऑफिस में २००७ में करवाया था.
                    मेरा ऐसा मानना है कि इस परंपरा का लाभ उठा कर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक और कार्य चालन की भाषा बनाने के लिए भारत सरकार को कदम उठाना चाहिए. भारत में अंग्रेजी का जो वर्चस्व है उसके कारण विश्व में भ्रान्ति है कि भारत को समझने के लिए  भारतीय भाषाओँ को समझना जरूरी नहीं है. यह भ्रान्ति दूर कि जानी चाहिए और शिक्षा, शासन और दैनिक व्यवहार में भारतीय भाषाओँ का अधिकाधिक प्रयोग होना चाहिए. वैसे संयुक्त राष्ट्र कि संस्थाओं में हिंदी का प्रवेश हो चुका है. यह यूनेस्को की एक अधिकारिक भाषा है.
                     हिंदी का विश्व व्यापी प्रचार और प्रसार आकस्मिक अथवा अप्रत्याशित नहीं हुआ है. इसका बहुत बड़ा श्रेय उन प्रवासी भारतीयों को हैं जिन्होंने अपनी हिंदी भाषा को संरक्षण प्रदान दिया. हम उन धरम गुरुओं और प्रचारकों को भी नहीं भुला सकते जिन्होंने हिंदी के माध्यम से अपने अपने मतों का प्रचार किया. इसी प्रकार उन व्यवसाईओं-व्यापारियों कि हिंदी सेवा का मूल्य भी हम शायद कभी आंक नहीं सकते हैं जिन्होंने व्यवसाय और व्यापार का माध्यम हिंदी को ही बनाये रखा.
                  विदेशों में स्थित भारतीयों के अतिरिक्त अनेक विदेशी विद्द्वानों ने भी हिंदी कि लोग संगत मर्यादा और महत्व को जान और पहचान लिया है. सन १६५५ में एडवर्ड टेरी ने अपनी पुस्तक "वोइस टु द इस्ट इन्डीस" में "हिन्दोस्तानी" को भारतीय बोलचाल की भाषा बताया है. सन १७०४ में तुरोनेसिस ने "लेक्सिकन लिंगुआ हिन्दोस्तानिका" नामक कृति प्रस्तुत की. ए हमिल्तन ने सन १७२७ में हिन्दुस्तानी को अपने एक यात्रा विवरण मुग़ल सुल्तान की एक सामान्य भाषा सूचित किया है. सन १८५२ में फ्रांस मैं दिए गए अपने एक भाषण में गार्सा-द-तासी ने 'हिन्दुई-हिन्दुस्तानी' को भारतीय लोकभाषा ठहराया था. इसी प्रकार सन १८८६ में लन्दन में प्रकाशित 'हाब्शन - जाब्शन' कोष में हिन्दुस्तानी (हिंदी) को भारतीयों की राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया है. इससे यह स्पष्ट हो जाता है की विदेशी विद्वान भी हिंदी की वास्तविक स्थिती से परिचित होकर हिंदी सीखने के इच्छुक भी थे. अनेकों विदेशी राष्ट्रों में वहां के विद्वानों ने हिंदी सीखने और सीखाने की दिशा में काफी उत्साह दिखाया है.
                       विदेशों में हिंदी-प्रचार प्रसार हेतु भारत सरकार की ओर से भी प्रयत्न होते रहे हैं. दुनिया के कई देशों में भारत सरकार ने दूतावासों में  हिंदी अधिकारी की नियुक्ति की है. इन हिंदी अधिकारिओं की सहायता से वहां हिंदी के लेखन, हिंदी समाचार पत्रों के संपादन ओर प्रकाशन, रेडियो, दूर दर्शन के प्रसारण ओर हिंदी दिवस पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. ओर इनके आयोजन में इन हिंदी अधिकारिओं का भरपूर सहयोग रहता है. इस सन्दर्भ में उलेखनीय है की मौरिसिअस की भाषा त्रिऔल है जिसमे अनेकों भारतीय भाषाओँ के शब्द सम्मिलित हैं. इसी प्रकार फिजी में संसद के अन्दर सदस्य फीजियन या फिर हिन्दुस्तानी में बोल सकता है. और वहां हिंदी की बहुत सी पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता है जिनमे 'फिजी समाचार', 'शांति दूत', 'जाग्रति', जय फिजी, और सन्देश प्रमुख हैं. बर्मा के रंगून में ब्राह्मण सभा का ऊँचा भवन 'ब्रह्म निकेतन' बर्मा के हिंदी प्रसार के इतिहास का साक्षी रहा है. बर्मा के सभी जिलों में हिंदी पढ़ाने वाले स्कूल हैं. दक्षिण अफ्रीका में शादी व्याह और धार्मिक उत्सवों के समय ख़ास तौर पैर डरबन जैसे शहर में  तो जैसे हिंदी भजनों और संगीत की जैसे धूम सी मच जाती है.जापान में तो १९११ से 'टोक्यो स्कूल फॉर फ़ोरेंन लैंगवेजेस' में हिन्दोस्तानी की पढाई होती है.प्रेमचंद का गोदान, पन्त का स्वर्णकिरण इत्यादि तो जापानी भाषा में अनुदित हो चूका है. सोविएत पाठक तो हिंदी के सभी प्रमुख साहित्य कारों से सुपरिचित हैं. कबीर, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार, भगवती चरण वर्मा, अमृत लाल नगर, उपेन्द्र नाथ अश्क, इलाचंद्र जोशी, जयशंकर प्रशाद, निराला, सुमित्रा नंदन पन्त, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, राम धारी सिंह दिनकर, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, धरम वीर भारती इत्यादि हिंदी साहित्यकार तो सोविएत रूस में बहुत ही लोक प्रिय हैं. इनकी रचनाओ का तो अनुवाद भी हो चूका है.अमेरिका में लगभग ३०-३५ विश्व विद्यालओं में हिंदी के पठन और पाठन की व्यवस्था है. ब्रिटेन में हिंदी प्रसार भारती नामक संस्था हिंदी के प्रचार और प्रस्सर में संलग्न है. यह संस्था हिंदी की कक्षाएं नियमित रूप से चलती है और साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन करती है. 'प्रवासिनी' नामक एक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन भी इस संस्था के द्वारा होता है. उपर्युक्त देशों के अतिरिक्त श्री लंका, हालैंड, फ़िलीपीन्स, वियतनाम, डेनमार्क, चीन, इजराइल, हांग कोंग, सूडान, वेस्ट इन्डीस, गुयाना, जैमैका, नेपाल, भूटान इत्यादि देशों में भी हिंदी के पठन और पाठन की उत्तम व्यवस्था हैं.  
                       विश्व के एक विशाल जन समूह की भाषा होने के कारण राष्ट्र संघ की भाषा बन सकती है.  हिंदी किसी भी क्षेत्र में विश्व की अन्य भाषाओँ से पीछे नहीं है बस केवल चाहिए कि हिंदी भाषी लोग और विशेषतः भारत सरकार अपनी इच्छा शक्ति दिखाये और हिंदी को उसका विश्व स्तरीय गौरव दिलाये. और फिर जनसँख्या, सम्रद्धि और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क कि दृष्टी से भी हिंदी का स्थान विश्व कि अन्य भाषाओँ कि तुलना में कम महत्वपूर्ण नहीं है.
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सहायक ग्रन्थ सूची :

राष्ट्र भाषा की समस्या - डॉक्टर राम विलास शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद    
भारतीय राष्ट्र भाषा - सीमायें और समस्याएं - डॉ सत्यव्रत
संपर्क भाषा हिंदी - डॉ लक्ष्मी नारायण गुप्त

Thursday, 23 June 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - VIII : राजभाषा हिंदी का संघर्ष

भारत के संविधान में राजभाषा के रूप में स्वीकृत हो जाने पर भी व्यवहारिक रूप में हिंदी के विकास में बाधाएं आती ही रहीं. हिंदी के प्रश्न को लेकर कुछ राजनैतिक नेता अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिए जनमानस में ग़लतफ़हमी पैदा करने में ही अपनी भलाई समझने लगे. इस प्रकार से हिंदी की स्थिती को कमजोर करने में बहुत कुछ इन राजनैतिक शक्तियां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से जिम्मेदार जरूर हैं. और हम आज भी देख सकते हैं की भारत की एकता की दुहाई देकर आज भी हिंदी आन्दोलनों का दमन ही किया जा रहा है और सरकारी-गैर सरकारी कार्यो में अंग्रेजी को ही प्राथमिकता मिल रही है. सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है की आज के भारतीय सरकारी तंत्र के कुछ केंद्र बिंदु तो स्वयं ही हिंदी बोल पाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं.भारत की यह स्थिती निश्चित रूप से अंतररास्ट्रीय मंच पर तो जरूर भाषा की भ्रामक स्थिती बनाये हुए है.
१९५६ में प्रदेशों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर करना शायद गलत ही था क्योंकि उसने राजभाषा और क्षेत्रीय भाषाओँ को प्रतिद्वंदियों जैसा बना दिया और दोनों में सहयोग के स्थान पर टकराव की सी स्थिती बन गयी जो आज भी आसानी से देखी जा सकती है. इससे व्यापक राष्ट्रीय भावना के बदले क्षेत्रीय भाषायों को ज्यादा बढ़ावा मिला और इससे स्वार्थी तत्वों ने इसे और भी मुखरित किया. जब १९६७ में हिंदी राजभाषा विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था तो अहिन्दी भाषी राज्यों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. सबसे पुरजोर विरोध के स्वर तो तमिलनाडु प्रदेश से आये. उस समय तमिल भाषा को दोयम दर्जे की भाषा बन जाने के खतरों का प्रचार करने वालों की केवल यह एक राजनेतिक साजिश ही थी. परिणाम स्वरुप न तो इस आन्दोलन से हिंदी भाषा और न ही तमिल भाषा का ही कुछ भला हुआ वरन हमारी इन दोनों भाषाओँ के टकराव की स्थिती में एक विदेशी भाषा को हम पर थोप दिया गया जिसने आज तक हमारी राज भाषा के साथ-साथ सभी क्षेत्रीय भाषाओँ को दोयम दर्जे का बना रखा है.
सामान्य रूप से हिंदी का विरोध करने वाले अधिकांशत: और अंग्रेजी का समर्थन करने वाले लोगों का तर्क है की हिंदी अभी निर्माणावस्था में है और इसमें वैज्ञानिक साहित्य नाम मात्र को है. परन्तु यह सत्य नहीं है क्योंकि हिंदी में पारिभाषिक और वैज्ञानिक शब्दों के अभाव की पूर्ती हो रही है. यह अभाव हिंदी या भारत की किसी अन्य भाषाओँ की अन्तर्निहित स्वाभाविक निर्बलता के कारण नहीं अपितु अंग्रेजी के अनुचित तनाव से उत्पन्न हुआ है. चूंकि हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य की मांग नहीं हुई, इसलिए वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण नहीं हुआ. अब यह मांग होने लगी है और हिंदी में वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और बोध्धिक साहित्य का बड़ी प्रबलता से निर्माण हो रहा है. हिंदी का किसी भी युग का साहित्य किसी दूसरी भाषा के किसी भी युग के साहित्य से किसी भी अंश में हीन नहीं है. इसका प्रमाण एक हज़ार वर्षों का हिंदी साहित्य है. 
मैं ऐसा समझाता हूँ हमारा प्रयास यह होना चाहिए की हमारी राजभाषा और क्षेत्रीय भाषाएँ सहचरी बन कर रहें न की प्रतिद्वंदी और राज भाषा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उचित स्थान दिलाकर भारत के प्रति राष्ट्रीय भावना का संचार करें. साथ में विदेशी भाषा का तो निसंदेह केवल न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय उपयोग करना होगा 

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सहायक ग्रन्थ सूची :

हिंदी का राजभाषा के रूप में विकास - डॉक्टर शिवराज शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद


Sunday, 17 April 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - VII : आजादी के बाद हिंदी भाषा

स्वाधीनता के आज ६२ वर्ष होने के बाद भी आज तक हम राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्तियाँ साकार नहीं कर पाए.....
            है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी
            हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी

अपने महापुरुषों और पूर्वजों के इन सपनों को हम आज तक साकार नहीं कर पाए हैं और हमारी राज भाषा हिंदी आज भी एक विदेशी भाषा अंग्रेजी से अपने वर्चस्व के लिए लड़ रही है.यह शायद इस लिए भी हुआ क्योंकि आजादी के बाद जब राजभाषा के रूप में हिंदी का मामला आया तब सदस्यों में राजभाषा के नामकरण  "हिंदी" और "हिन्दुस्तानी" को लेकर गंभीर विवाद था. हिंदी को "हिन्दुस्तानी" बनाने  में गाँधी जी भी भूमिका रही, ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि शायद साम्प्रदायीकता के प्रश्न में उन्होंने भाषा जो भी शामिल कर लिया था. जैसे "हिन्दुस्तानी" भाषा "हिंदी" और "उर्दू" भाषा का मिस्त्रण मात्र है. जैसा मैं पहले भी लिख चूका हूँ कि विद्वानों ने उर्दू भाषा को केवल हिंदी में फारसी लिपि का प्रयोग मात्र माना है. भाषा के नामकरण को लेकर शायद यह असमंजस कि स्थिती आज तक बनी हुई है. और आजतक कोई भी तथाकथित भारत की लोकतान्त्रिक सरकारें द्वारा इस धार्मिक-साहित्यिक विषय को सुलझाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ. परिणाम, आज तक हम अपनी राज भाषा और राष्ट्र भाषा के लिए चर्चा और संघर्ष कर रहे हैं.

वैसे भारत के संविधान में हिंदी की स्थिति इस प्रकार है....
विधान के अनुच्छेद ३४३(१) में साफ़ तौर पर यह  निर्दिष्ट है कि संघ कि राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा. साथ ही यह भी कहा गया है कि उपयुक्त व्यवस्था बनाने तक अर्थात पंद्रह वर्ष कि अवधि तक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा.
अनुच्छेद ३४३(२) में किसी बात के होते हुए भी संसद उक्त पंद्रह वर्ष कि कालावधि के पश्चात विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का, अथवा, अंकों के देवनागरी रूप का, ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग अनुबंधित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लेखित हो.
अनुच्छेद ३४४ में राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। प्रयोजन यह था कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग हो, संघ और राज्यों के बीच राजभाषा का प्रयोग बढ़े, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को सीमित या समाप्त किया जाए।
विधान के अनुच्छेद ३५० में निर्दिष्ट है कि किसी शिकायत के निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को संघ में या राज्य में प्रयोग होनेवाली किसी भाषा में प्रतिवेदन देने का अधिकार होगा।
१९५६ में अनुच्छेद ३५० क संविधान में अंतःस्थापित हुआ और यह निर्दिष्ट हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए।
हिंदी भाषा के विकास के लिए यह विशेष निर्देश अनुच्छेद ३५१ में दिया गया कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके एवं उसका शब्द भंडार समृद्ध और संवर्धित हो।

ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी अपने एक लेख में लिखते हैं
"भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे भाषाएँ भारतीय स्वाधीनता के अभियान और आंदोलन को व्यापक जनाधार देते हुए लोकतंत्र की इस आधारभूत अवधारणा को संपुष्ट करतीं रहीं कि जब आज़ादी आएगी तो लोक-व्यवहार और राजकाज में भारतीय भाषाओं का प्रयोग होगा।"

महात्मा गांधी ने भागलपुर में महामना पंडित मनमोहन मालवीय का हिंदी भाषण सुनकर अनुपम काव्यात्मक शब्दों में कहा था, ''पंडित जी का अंग्रेज़ी भाषण चाँदी की तरह चमकता हुआ कहा जाता है, किंतु उनका हिंदी भाषण इस तरह चमका है - जैसे मानसरोवर से निकलती हुई गंगा का प्रवाह सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता है।'' आज भी हमारे समय में हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का प्रत्येक भाषण भी इसी प्रकार सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता हुआ गंगा के प्रवाह की तरह लगता है। फिर भी कुछ बात है की हम अपनी राज भाषा के प्रति या तो उदासीन हैं और या फिर हमें उदासीन बनाये रखा जा रहा है.

अत: हमें जागना होगा और देश प्रेम के साथ भाषा प्रेम को भी अपने परिचय का आधार बनाना ही होगा. वह भाषा चाहे हिंदी के सहचरी के भांति क्षेत्रीय भाषाएँ ही क्यों न हो परुन्तु हमें अपने मानसिक दासता के प्रतीक एक विदेशी भाषा के विरोध में स्वयं को और अपने बच्चों को जागरूक बनाना होगा. हमें याद करना होगा भारतेंदु जी का यह कथन .......
                   ''निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।''

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सहायक ग्रन्थ सूची :

हिंदी का राजभाषा के रूप में विकास - डॉक्टर शिवराज शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद

इन्टरनेट :
http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/hindi_diwas/samvidhan_me_hindi.htm (20-March-2011)

Monday, 7 March 2011

दिनांक ०६-०३-२०११

हिंदी-ब्लॉग परिवर्तन - मार्च 2011 
कुछ समय से मुझे ऐसा लग रहा था कि यह ब्लॉग बड़ा ही एकाकी और उबाऊ सा हो रहा है क्योंकि रोजाना कक्षा के बारे में सामान्य गतिविधियों को लिख लिख कर लेखों में नवीनता सी नहीं आ रही थी.  इसका एक कारण यह भी है कि साल २०१० के लेखों में भी कक्षाओं का विवरण उपलब्ध है और कक्षा का स्वरुप अथवा समय सारणी कैसी हो यह हम साल २०११ के प्रथम और दूसरे कक्षा विवरण से (गैर व्यावसायिक उपयोगों के लिए) प्राप्त कर सकते हैं. अब नित्य यहाँ पर हम कक्षाओं का विवरण नहीं देंगे वरन इस ब्लॉग का उपयोग हिंदी के प्रचार और प्रसार और हिंदी पर चर्चा करने में लगाया जायेगा. 
फिर भी यदि ऐसा लगा कि कक्षा में यदि कुछ भी उल्लेख करने योग्य हुआ तो उससे हम अपने इस ब्लॉग में स्थान जरूर देंगे. इसके अतिरिक्त आपके सुझाव पर भी हम जरूर टिप्पणी करेंगे. हम देव भाषा संस्कृत की भी यहाँ पर चर्चा करेंगे.
                   इस प्रकार से यह ब्लॉग कुछ संवादात्मक (इन्टरैक्टिव) और जीवंत सा भी लगेगा.कुछ विचार विमर्श और सुझाव के आधार पर इस ब्लॉग का नाम "राजभाषा हिंदी २०१०" बदला गया है.आपको नियमित साप्ताहिक लेख शायद न मिले परन्तु लेखों की आवृत्ति निरंतर बनी रहेगी. अपने इस परिवर्तन का  स्वागत हम हिंदी के हास्य कवि श्री ऋषि गौढ़ जी द्वारा रचित हास्य कविता के साथ करते हैं . यह संस्कृत में  अनुवादित है........

"आधुनिक विद्यार्थी:
एकलव्य: भांति
ना ददाति अन्गुठम कर्तिरित्वंम
समर्पियतम गुरु: दक्षिणाम:
अन्गुठम प्रदर्शयम:"

कृपया अपने सुझाव और विचार हम तक भेजते रहें.
धन्यवाद