Saturday, 18 June 2016

हिंदी साहित्य का इतिहास - III : भक्तिकाल १४००-१७०० - भाग एक

भाग एक 

भक्ति साहित्य का आधार भक्ति आंदोलन है, इसका अर्थ हुआ की भक्ति  साहित्य की एक वैचारिक भूमि थी. भक्ति आंदोलन की विशेषता यह बताई गयी है की इसमें धर्म साधना का नहीं वरन भावना का विषय बन गया था. महाराष्ट्र के संत नामदेव (जन्म सन् १२५६ ई) की रचनाओं से हिंदी में भक्ति साहित्य की प्रधान प्रवृति बनी रही. इस धार्मिक और साहित्यिक आंदोलन ने हिंदी को कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा जैसे कवि दिए. इनकी कवितायेँ इतनी लोकप्रिय एवं उत्तम हैं की भक्ति कल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है.

पं हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार भक्ति आंदोलन भारतीय चिंता-धारा का स्वाभाविक विकास है.नाथ सिद्धों की साधना, अवतारवाद, लीलावाद और जातिगत कठोरता, दक्षिण भारत से आई हुई धारा में घुल मिल गयी, ऐसा प्रतीत होता है. पं रामचन्द्र शुक्ल जी भी इसके ऐतिहासिक आधार पर टिप्पड़ी करते हुए कहते हैं कि दक्षिण भारत से आये हुए भक्ति मार्ग को उत्तर भारत ने बड़े ही  व्यापक रूप में अपना लिया था. 

शायद इसका कारण दक्षिण भारत की उस समय (१३वी शताब्दी एवं १४ वी शताब्दी ) की सामाजिक और ऐतिहासिक स्थितियां स्पष्ठ करती हैं जिसने अवर्णों एवंम स्त्रियों को सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से ऊपर उठने के लिए एक नया मार्ग ढूंढने की ओर प्रेरित किया, लेकिन यह काम किसी सुसंगत विचारधारा अथवा दर्शन के बिना नहीं हो सकता था. दर्शन के दो अंग होते हैं - तत्त्व बोध और उसी के अनुकूल उत्पन्न साधना मार्ग जिसे आजकल जीवन दर्शन कहते हैं. 

इस विषय में शंकराचार्य (जन्म सन् ७८८ ई) का अद्वैत और रामानुजाचार्य (जन्म सन् १०१७ ई) का विशिष्टाद्वैत को एक साथ देखना चाहिए। शंकराचार्य जगत को मिथ्या और ब्रह्म को विशेषण रहित। दूसरी ओर रामानुजाचार्य जगत को मिथ्या नहीं वरन वास्तविक मानते थे और ब्रह्म को विशेषणयुक्त। उनके अनुसार इस जगत को वास्तविक मानकर उसे महत्त्व देने में ही भक्ति की लोकोन्मुख्ता एवं करुणा है.  

भक्ति तो पहले भी थी परन्तु वह केवल साधना मात्र थी, आंदोलन नहीं. ऐतिहासिक स्थितियों की अनुकूलता में वह प्रवत्ति व्यापक एवं तीव्र होकर धार्मिक आंदोलन बन गयी. 

शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य के समय की ऐतिहासिक परिस्थियां भी इसी और चिन्हित करती हैं कि अवर्णों को सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से ऊपर उठाने की निसंदेह चेष्ठा की गयी थी.  दक्षिण भारत में पहली शताब्दी के बाद कई शताब्दियों तक राज सत्ता पराक्रमी शासकों के हाथ में रही. संगम काल में चोलवंशी शासक करिकाल ने कावेरी नदी के जल को नियंत्रित करके सिचाई के व्यवस्था की थी और एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी बनवाया था. कांचीपुरम पल्लवों की राजधानी थी, ७ वीं शताब्दी के अंतिम और ८ वीं शताब्दी के प्रारम्भ में पल्लब शासक नर्सिंग वर्मन ने स्थापत्य को अत्याधिक बढ़ावा दिया और उसने कांची का प्रसिद्ध राजसिंघेश्वर मंदिर बनवाया। उसके समय में चित्रकला की भी बहुत उन्नति हुई थी. इस सब से कांची में शिल्पियों को बहुत सम्मान मिला। मद्रास म्यूजियम के उत्तम चोला ताम्रपत्र के अनुसार कांची पुरम के बुनकरों को स्थनीय मंदिर की वित्तीय देखभाल का काम सौंपा गया था. इससे बुनकरों को व्यापारियों-वैश्यों जैसा ही सम्मान मिला। इसके अतिरिक्त आचार्य रामानुज का जन्म कांची पुरम के पास हुआ था, वे अधधयन के लिए बचपन में ही कांचीपुरम आ गए थे. वहां उनकी भेंट कांचीपूर्ण से हुए. कांचीपूर्ण रामानुजाचार्य के शूद्र गुरु थे. यह भी विदित है की प्रसिद्ध वैष्णव अलवार संत-कवि दक्षिण में ही थे, इन्ही में एक महिला 'अंदाल' भी थी और प्रसिद्ध अलवार नाम्म या शठकोप शुद्र थे.  

रामानुजाचार्य की ही परंपरा में रामानन्द (जन्म सन् १३०० ई के आस पास ) हुए जिनके बारे में कहा जाता है की वे भक्ति को दक्षिण से उत्तर में लाये।

जैसी स्थिति उत्तर भारत में १३ वीं  और १४ वीं शताब्दी में उत्पन्न हुए वह, जैसा ऊपर बताया गया है, दक्षिण में पहली शताब्दी के बाद ही पैदा हो गयी थी. इसी समय दिल्ली सल्तनत (१३ वीं) से मुस्लिम शासकों का शासन भी शुरू हो गया था और 16वीं शताब्दी में तो मुग़ल शासक तमाम खुनी लड़ाईयों के बाद पूर्णतया स्थापित हो गए थे. इसलिए शायद डॉ रामचद्र शुक्ल जी इसे इस्लामी आक्रमण से पराजित हिन्दू जनता की असहाय एवं निराश मनस्थिति से जोड़ा था. वे एक और इससे दक्षिण भारत से आया हुआ मानते थे, दूसरी ओर  यह भी मानते थे की अपने पौरुष से निराश-हताश जाति के लिए भगवान् की सकती और करुणा के ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था. हो सकता है शुक्ल जी इस उदासी और निराशा को भक्ति का कारण  न बता रहे हों वरन वे उत्तर भारत की हिन्दू जनता की उस मानसिकता को बता रहे हों जिसने दक्षिण भारत से आये हुए भक्ति मार्ग को इतने व्यापक रूप में अपना लिया था. 

हिंदी साहित्य के चारों कालों को देखने से पता चलता है की साहित्य के योगदान में अवर्णों और नारियो की सह स्थिति हैं. हिंदी में अवर्ण साहित्यकार अधिक संख्या में या तो भक्ति काल में हुए या फिर आधुनिक काल में. नारी रचनाकारों की भी कमोवेश यही स्थिति है.  

 अपने अगले भाग में हम भक्ति काल के सम्प्रदायों, कवियों और निर्गुण-सगुण  पर चर्चा करेंगे..... धन्यवाद

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सहायक ग्रन्थ सूची :
हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२
http://gadyakosh.org/gk/हिन्दी_साहित्य_का_इतिहास_/_आचार्य_रामचंद्र_शुक्ल


Thursday, 12 May 2016

सुनिए प्रधानमत्री जी

आज मैं बात करूँगा उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार की वापसी की. हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में बर्खास्त की गयी कांग्रेस की सरकार को वापस बहुमत साबित करने का मौका दे कर केंद्रीय सरकार की मंशा पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाया है और राष्ट्रपति शासन को हटा कर निर्वाचित सरकार को फिर से काम करने का मौका दिया. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय सराहनीय है. 

परन्तु क्या हो गया है मोदी सरकार को. मोदी सरकार तो ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस साफ़ के स्थान पर कांग्रेस की भांति कार्य करने पर उतारू है. यह तो एक किताबी संवैधानिक ज्ञान है की यदि थोड़ा भी प्रांतीय सरकार के बहुमत साबित करने की सम्भावना होती है तो एक जिम्मेदार केंद्रीय सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रांतीय सरकार तो बहुमत साबित करने का पूरा अवसर दे मगर मोदी सरकार तो लगता है की राष्ट्रपति शासन लगने की इतनी जल्दी थी की उसने उत्तराखंड सरकार को इसका मौका ही नहीं दिया और आनन फानन में राष्ट्रपति शासंन लगा दिया. अपने इस कृत्य से मोदी सरकार पर तानाशाही होने के आरोपों को बल मिलता है. लोकतंत्र जिम्मेदारी से चलता है न की मन मानी से. देश की कोटि कोटि जनता ने श्री मोदी जी को बहुत आशा और विशवास के साथ २०१४ के लोकसभा चुनाव में बहुमत दिया है इस विश्वास के साथ कि भारत माता  का यह बालक अपने जीवन के अनुभवों से देश के जनता का दुःख दर्द ज्यादा अच्छे तरीके से समझ कर उन्हें दूर करने में कोई कोर कसर नहीं रखेगा। इसलिए हमारे प्रधानमत्री मोदी जी का यह नैतिक दायित्व है कि वे जनता के इस भाव को अच्छे से समझे और उस दिशा में निरंतर कार्य करें अन्यथा ऐसा न हो क़ि जनता की कांग्रेस के विकल्प के तौर पर सरकार चुनने की इच्छा और अपेक्षा दोनों ही समाप्त हो जाये और पुनः कांग्रेस आने वाले कई वर्षों तक फिर सत्ता रूढ़ हो जाये और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना सपना ही रह जाये. और यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी के आपातकाल में गैर कांग्रेस सरकार का एक प्रयोग पहले ही असफल हो चूका है.  

यदि मोदी सरकार का यह अलोकतांत्रिक मंतव्य किसी  राजनैतिक अथवा अराजनैतिक सलाह का परिणाम है तो यह जिम्मेदारी भी प्रधानमत्री महोदय की है को वे अपने सलाकारों पर नियंत्रण रखें और स्वस्थ लोकतंत्र का पाठ याद दिलाएं कि लोकत्रंत्र में नर ही नारायण होना चाहिए और उसके हेतु ही सारी योजनाएं केंद्रित रहनी चाहिए। 

भारत बहुत बड़ा और विकट भिन्नताओं वाला देश है और इसकी आवश्यकताएँ भी असीमित है. कुछ भारतमाता की संतानें गरीबी के चरम पर जीवन यापन करने को विवश है, कुछ नौजवान बेरोजगारी से ग्रसित हैं, बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और उस पर शिक्षा, स्वास्थ, सूखा, बाढ़, आपदा, सामान्य जीवन हेतु अत्यन्त अल्प आवश्यकताओं हेतु भारत माता की संतानें प्रतिदिन संघर्ष करती है. और उसके ऊपर कुछ लोग तो हर पल भारत माता को कलंकित और आहत करने को तत्पर हैं. 

ऐसे में प्रधानमत्री जी यदि इन समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ण सामर्थ्य और क्षमता से कार्य करें तो ही निसंदेह वे भाजपा के "चाल चरित्र और चेहरा" वाले नारे को चरितार्थ कर पाएंगे अन्यथा यह नारा नारा ही रह जायेगा और भारत माता को एक बार फिर निराशा ही हाथ लगेगी।  

Saturday, 22 August 2015

नेट नूट्रलिटी

आज कल नेट नूट्रलिटी अर्थात इंटरनेट निरपेक्षता पर विश्व भर में चर्चा हो रही है तो सोचा की चलिए इस पर भी कुछ विचार रखे जाएँ.

सबसे पहले, क्या है यह इंटरनेट निरपेक्षता, यह एक प्रकार की कंप्यूटर शब्दावली है जिसमे इंटरनेट की सुविधा देने वाली कंपनी या कम्पनिओं से यह अपेक्षा रहती है की वह अपने अपने ग्राहकों को निरपेक्ष सुविधा दें. 
इसका मतलब यह हुआ की उनके रूट (इंटरनेट मार्ग) से जो भी वेब साइट्स उनके ग्राहकों द्वारा देखी जाएँ उनमे किसी तरह का कोई पक्षपात न हो.

यह पक्षपात कई रूप में हो सकता है. जैसे, कुछ इंटरनेट कंपनियां कुछ विशेष प्रकार के उत्पादों को ज्यादा जल्दी अपने ग्राहकों को उपलब्ध करा सकती है जबकि कुछ दूसरे (जो इस इंटरनेट कंपनी को पसंद न हों) उत्पादों को उपलब्ध करने में देरी कर सकती हैं. दूसरा उदाहरण यह हो सकता है की आप कोई संगीत सुनना चाहते हैं परन्तु आपका इंटरनेट उपलध कराने वाली कंपनी (इंटरनेट प्रोवाइडर) उस संगीत को आपके उपकरण में धीरे धीरे उपलब्ध  कराये और जिसका परिणाम यह हो कि ज्यादा समय लेने के कारण या तो आप उस संगीत को अपने उपकरण में ले ही ना और या फिर आपको ज्यादा मूल्य देना पड़े अपने उपकरण में वह संगीत लेने के लिए.   


अब यह समस्या क्यों हुई इसका शायद उत्तर है इंटरनेट कि निरत बदलती तकनीक और इंटरनेट उपलब्ध करने वाली कम्पनिओं का लालच . ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इंटरनेट कि बढ़ती हुई तकनीक ने इंटरनेट को अब और अधिक तेज़ और उपभोक्ता कि प्राथमिकताथमिकता अनूरूप मॉडल बना दिया है. इसका अर्थ यह हुआ कि अब इंटरनेट मोबाइल कम्पनिओं द्वारा भी उपलब्ध कार्य जा रहा है. इन मोबाइल फ़ोन कम्पनिओं ने अपनी त्वरित मेसेजिंग सिस्टम से काफी पैसा बनाया है. परन्तु आप ऐसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर आ गए हैं कि त्वरित मेसेजिंग सिस्टम कि उपयोगिता लगभग ख़त्म सी हो गयी है. ऐसे कंप्यूटर सोफ्ट्वरों में स्काइप और व्हाट्सप्प जैसे सॉफ्टवेयर भी हैं जो यदि आपके पास इंटरनेट कि सुविधा हो तो यह सॉफ्टवेयर आपको आसानी से मुफ्त फ़ोन पर बात करने कि सुविधा देते हैं. इससे टेक्नोलॉजी कि दुनिया में.वौइस् ओवर आईपी कहा जाता है. अब समस्या यह होगई मुख्यतौर पर मोबाइल फ़ोन कम्पनिओं के लिए कि उनकी त्वरित मेसेजिंग सिस्टम की उपयोगिता खत्म हो गयी और लोग उनके द्वारा दी गयी इंटरनेट की सुविधा से मुफ्त में फ़ोन पर बात कर लेते हैं. और यहीं से शुरू होता है लालच और हाई टेक्नोलॉजी का मत विभाजन और कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट.

इन कंपनियों ने अब अपने ग्राहकों द्वारा दूसरी उपयोगी सुविधाओं के लिए इंटरनेट को धीमा करना शुरू कर दिया और ऐसे हर इंटरनेट मार्ग को निम्न प्राथमिकता में रखना शुरू कर दिया जिससे उनको आय नहीं होती है, इंटरनेट सुविधा देने की आय के ऊपर. इंटरनेट सुविधा देने की आय तो वे पहले ही या तो मासिक अनुबंध द्वारा अथवा एक मुश्त फ़ोन के मूल्य से निकाल लेते हैं. अपने इसी लालच के कारण वे अब अपनी प्रतियोगी कम्पनिओं के इंटरनेट मार्ग को व्यस्त रखते हैं और आपको इंटरनेट की धीमे गति मिलती है.     

स्वस्थ व्यवसाइक वातावरण तो यह होता है कि सभी कम्पनिओं को अपने अपने उत्पाद दिखाने के लिए बराबर समय   मिलना चाहिए और वह भी सामान गति से जिससे ग्राहक स्वयं यह निर्णय कर सके की उससे किस उत्पाद में ज्यादा रूचि है ना कि ग्राहकों पर परोक्ष रूप से वह ही परसा जाये जो व्यवसाइक दृस्टि से ही अधिक आय अर्जित कर सके. 

Saturday, 4 April 2015

हिंदी साहित्य का इतिहास - II : आदिकाल १०००-१४००

आज हिंदी साहित्य के लेख को आगे बढ़ाते हैं. आज हम अपने पूर्व के लेखानुसार हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों का विश्लेषण करेंगे. आज का लेख आदि काल को समर्पित है. 

आदिकाल १०००-१४०० 
यह विविध और परस्पर विरोधी प्रवर्तियों का काल है. राजनैतिक दृष्टि से उत्तरी भारत छोटे छोटे राज्यों में बंटा हुआ था. हर्षवर्धन (लगभग ६०६-६४७) के बाद किसी ने केंद्रीय सत्ता स्थापित नहीं की. आवागमन के साधनों के अविकसित होने के कारण विभिन्न स्थानों पर रची गयी कृतियों में भाषागत विभिन्नताओं और क्षेत्रीयता का रंग अधिक है. इसलिए आदिकाल का साहित्य अनेक बोलियों का साहित्य प्रतीत होता है. धार्मिक दृष्टि से इस काल में अनेक ज्ञात और अज्ञात साधनाएं प्रचलित थीं. सिद्ध, जैन, नाथ, आदि मतों का इस काल में व्यापक प्रचार था. सिद्धों का सम्बन्ध बौद्ध धर्म की कालांतर की तंत्र मंत्र की साधना, अर्थात वज्रयान, से था. इन्होने सहज जीवन पर बल दिया और वर्णाश्रम व्यवस्था पर तीव्र प्रहार किया है. सिद्धों का स्थान मध्य देश का पूर्वी भाग है. नाथों नें भी 'जोई जोई पिण्डे सोई ब्रह्मांडा' अर्थात जो शरीर में है वही ब्रह्माण्ड मैं है, कह कर ब्रह्मचर्य, वाक् संयम, शारीरिक- मानसिक सुचिता, मद्य-मांस के त्याग पर जोर दिया है.  नाथों का स्थान मध्य प्रदेश  का पश्चिमोत्तर भाग बताया जाता है.  जैन मतावलम्बी रचनाएँ दो प्रकार की हैं, पहली, नाथ-सिद्धों के तरह उपदेश, नीति और सदाचार पर बल है और दूसरी, पौराणिक, जैन साधकों की प्रेरक जीवन कथाएं और लोक प्रचलित कथाओं को आधार बना कर जैन मत का प्रचार किया गया लगता है.  जैन मत के प्रभाव में अधिकांश काव्य गुजरात, राजस्थान और दक्षिण में रचा गया है. 
इसके अतिरिक्त, पंडित रामचंद शुक्ल जी ने आदिकाल के तीसरे चरण को वीरगाथा काल  भी कहा है जिसमे श्रृंगार परक लौकिक काव्यों के साथ साथ कवि अपने आश्रय दाताओं और उनके पूर्वजों के पराक्रम , रूप और दान इत्यादि की प्रशंसा करते थे. इस काल में भूमि और नारी का हरण राजाओं पैर लिखे गए काव्य का सामान्य विषय है.पृथ्वी राज रासो, प्रसिद्ध चन्दरवरदायी की रचना, इस काल का एक महत्वपूर्ण काव्य है. भाषा की दृष्टि से यह अपभ्रंश और हिंदी का संधिकाल रहा है. आदिकाल का साहित्य शुद्ध अपभ्रंश अथवा शुद्ध हिंदी का न होकर अपभ्रंश-हिंदी का साहित्य है. साथ ही इस्लाम का भी प्रवेश हो चुका था और इसका भी प्रभाव आदिकाल के अंतिम चरण के प्रसिद्ध कवि अमीरखुसरो में दिखाई देता है. आदिकाल समाप्त होते होते दिल्ली के सिंहासन पर अलाउद्दीन ख़िलजी (लगभग १२९६-१३१६) जैसा शासक दिखाई देता है जो मध्य देश ही नहीं लगभग समूचे देश में अपना शासन स्थापित करता है. 

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सहायक ग्रन्थ सूची :
हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२

Wednesday, 4 February 2015

दिल्ली दरबार

आज फिर कुछ लिखने का मन कर रहा तो आज कल दिल्ली, भारत में चल रहे चुनावी दंगल की बात हो जाये. एक तरफ जहाँ भारत के प्रधान मंत्री की साख दाँव पर है तो दूसरी तरफ भारत की राजनीती में एक उभरते हुए व्यक्तित्व की विश्वसनीयता का प्रश्न है

दोनों तरफ ही राष्ट्रवाद और राजनैतिक सुधारवाद का बोलबाला है और दोनों ही पक्ष अपने अपने नेता के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध और विश्वस्त नज़रें आ रहे हैं.

परन्तु ऐसा लगता है की कुछ तो बात है जो प्रधान मंत्री जी की पार्टी को असमंजस मैं डाले हुए है. ऐसा में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस लेख के लिखे जाने तक प्रधान मत्री जी दिल्ली नगर में करीब ३ रैलियां सम्भोधित कर चुके हैं जो उनके कद के नेता के लिए बहुत ज्यादा है. याद कीजिये २०१४ के आम चुनाव की, प्रधान मत्री जी की एक चुनावी सभा उस पूरी डिस्ट्रिक्ट और कभी कभी पूरे राज्य विशेष के लिए पर्याप्त होती थी तो यहां क्या बात है की प्रधान मंत्री जी अभी कुछ और दिल्ली में आम सभाओं को संम्बोधित करने का मन बना रहे हैं. और इसके ऊपर, यदि खबरों की सुने, तो भाजपा ने अपने करीब १५० क्षेत्रीय और राष्ट्रीय नेताओं की फ़ौज लगा दी है चुनाव प्रचार में. उसके भी ऊपर भाजपा नें अपने कैडर के नेताओं पर विशवास न करके एक बाहरी उम्मीदवार श्रीमती किरण बेदी को मुख्य मंत्री के रूप में मैदान में लाना पड़ा.

यह सब कुछ करने के बाद भी भाजपा के शीर्ष नेता अपनी जीत तो सुनिश्चित बताने में हिचक ही रहें हैं.

दूसरी तरफ भी देश भक्ति और भ्रस्टाचार जैस ज्वलंत मुद्दों पर राजनीती का खाता खोलने वालों का आत्मा विशवास भी डोला हुआ दिख रहा है. बार बार ४९ दिनों में सरकार गिरा देने का प्रश्चाताप जनता के बीच में अपनी खोई हुई विश्वसनीयता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास ही लगता है. और उसके ऊपर से निरंतर साथ छोड़ते हुए पुराने साथी भी उनकी पार्टी के लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हैं. और आप पार्टी के नेता के अतिरिक्त कोई भी प्रभावशाली व्यक्तित्व का अभाव भी उनकी प्रशाशनिक क्षमताओं पर भी प्रश्नचिन्ह ही लगाता है.

काँग्रेस का तो सूपड़ा ही जैसे साफ़ दिखाई देता है. प्रभावशाली नेतृत्व क्षमताओं के रहते हुए भी उनकी विश्वनीयता आम जनता में गंभीरता रूप से सशंकित ही है और लगता है जैसे २०१४ के आम चुनाओ की ही भांति कांग्रेस पार्टी को मायूस ही होना पड़ेगा और ऐसा हाल फिलहाल में कराये गए सर्वेक्षणों से भी लगता है. परन्तु शायद अपनी इस स्थिति के लिए स्वयं काँग्रेस खुद ही जिम्मेदार है.

इसप्रकार से सभी पार्टियां कुछ भी अपने बारे में निश्चितता से नहीं कह सकती है कि चुनाओ के परिणाम उनके पक्ष में आएंगे या नहीं. परन्तु याद कीजिये ऐसा अभी कुछ महीन पहले ही हुए आम चुनाव में नहीं था और भाजपा मदमस्त हाथी की भांति विजय विजय का राग आलाप रही थी और जनता नें उसे सत्ता में आने का मौका भी दे दिया । और उसके साथ २-३ विधान सभा चुनाव में भी विजय दिलवाई।

ऐसा दिल्ली के चुनाओ मैं नहीं कहा जा सकता क्योंकि यही तो शायद लोकशाही की सुंदरता है की कुछ भी अनुमान लगा लीजिये परन्तु परिणाम जनता अपने विवेक से उचित समय पर उचित ही लेती रही है, वह चाहे इमरजेंसी के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी को उखाड़ फेकना हो या फिर मंडल कमंडल की चौकड़ी की सत्ता में पुनः वापसी ना करने देना हो.

अब प्रश्न यह उठता है की फिर किसको सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए, वैसे तो सबसे बड़ी दावेदारी, मेरी समझ में, आप पार्टी को है और इसका कारण भी है. कारण यह है कि भाजपा को काफी राज्यों में सरकार चलाने का अवसर मिल चुका है और उनके पास भाजपा शाशित राज्यों में जन कल्याण के कार्यक्रम चला सकते हैं और देश भक्ति और सुशासन का प्रमाण देने का अवसर है . दूसरी तरफ आप पार्टी को अभी तक पूरा अजमाना बाकी है, वे या तो ४९ दिनों मैं सरकार की जिम्मेदारिओं से भाग गए या फिर आम चुनाओ में पर्याप्त संख्या न प्राप्त कर सके.

और एक स्वस्थ लोक तांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और भाजपा इस भूमिका को वर्तमान परिस्थिओं में सबसे अछे तरीके से निभा सकती है क्योकि उसकी. केंद्र में सरकार है और राज्य सरकार के गलतियों को जनता के सामने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ला सकती है.

अब रही बात कांग्रेस की तो अभी उसे थोड़ा सत्ता से बाहर रह कर आंदोलन का अभ्यास करना चाहिए और विधान सभी के अंदर और बाहर एक सकारात्मकता के साथ काम करते हुए सरकार और विपक्ष की विफलताओं को जनता के बीच में लाना चाहिए जिससे दिल्ली को भाजपा और आप दोनों के ही विकल्प के रूप में एक तीसरी राजनैतिक शक्ति मिल सके.

Monday, 8 April 2013

हिंदी भाषा का इतिहास : हिंदी साहित्य का काल विभाजन - I

 आज हम हिंदी साहित्य के इतिहास पर चर्चा करेंगे। हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारंभ संभवतः तब हुआ होगा जब हिंदी में रचनाएँ प्रारंभ हुई होंगी। भाषा का प्रवाह धारा के प्रवाह की भांति नहीं होता और ठोस वस्तुओं की तरह उसका विभाजन संभव नहीं है। परन्तु फिर भी विद्वान मानते हैं की हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पूर्व मिलने लगता है। हिंदी साहित्य के इतिहास का विभाजन कालक्रम की दृष्टी से चार कालों - आदि, पूर्वमध्य, उत्तरमध्य और आधुनिक में किया जाता है।

पंडित रामचंद्र शुक्ल ने काल क्रम से विभाजित इस काल खंडो का नामकरण इसप्रकार किया है - आदिकाल को अपभ्रंश काव्य और देश भाषा काव्य में विभाजित करके देश भाषा काव्य को 'वीरगाथा' नाम दिया। अपभ्रंश काल में जैन, सिद्धों और नाथ कवियों द्वारा लिखित सामग्री को वे साहित्य की कोटि में रखने को तेंयार नहीं थे। उनके अनुसार देश भाषा काव्य की वीरगाथात्मता ही समूचे आदिकाल की प्रधान साहित्यिक प्रवृति हैं। इसलिए वि आदिकाल को 'वीरगाथाकाल' कहना उचित समझते थे। पूर्वमध्य काल को वे 'भक्तिकाल' और उत्तम काल को वे 'रीतिकाल' कहते हैं। आधुनिक काल को वे 'ग़द्दकाल' कहना उचित समझते हैं। शुक्ल जी द्वारा किया गया हिंदी साहित्य के इतिहास का नाम करण और काल विभाजन इस प्रकार से है,

आदिकाल   - संवत १०५० से १३७५
पूर्वमध्य काल (भक्तिकाल)  - संवत १३७५ से १७००
उत्तम काल (रीतिकाल) - संवत १७०० से १९००
आधुनिक काल (ग़द्दकाल) - संवत १९०० से ........

अपने आगे की श्रंखला में हम एक एक करके इन कालों की विवेचना करेंगे।
तब तक के लिए आज्ञा  दीजिये। धन्यवाद

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सहायक ग्रन्थ सूची :
हिंदी साहित्य का संछिप्त इतिहास - NCERT - कक्षा १२

Saturday, 1 December 2012

एक विचार

वर्ष 2012 समाप्त होने को है और मैं एक बहुत ही लम्बे समय के पश्चात अपने इस प्रिय ब्लॉग पर लौट सका हूँ। कुछ व्यस्तताओं और निजी अस्वस्थथा होने के कारण यह विलंभ हुआ, आशा है आप लोग क्षमा करेंगे।
कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ की कहाँ से शुरू करूँ। कहावत है की शुरुवात अच्छे से ही करनी चाहिए तो अभी कुछ दिन पहले ही समाचार आया है कि ब्रिटेन के भारतीय मूल के बड़े व्यवसायी श्री लक्ष्मी मित्तल और फ्रांस सरकार में समझोता होगया है कि श्री मित्तल अब अपना फ्लोरंगे साईट की स्टील फैक्ट्री नहीं बंद करेंगे जिससे लगभग 650 फ्रांस के लोग बेरोजगारी के खतरे से बच गए और इस प्रकार से विश्व ने देखा की किस प्रकार से भारतीय भी जन हित को ध्यान में रख कर व्यवसायिक योजनायें बनाने में सक्षम हैं। इसी के साथ कुछ समय पहले यह समाचार भी सुखदायी थे कि अग्नि V के प्रक्षेपण के साथ ही भारत भी विश्व की 6 बड़ी सामरिक शक्तियों के समूह में  शामिल हो गया है। इसी के साथ भारत के पास भी अब 8000 किलोमीटर लम्बी दूर मार करने वाली प्रक्षेपात्र उपलब्ध है।
ख़राब समाचरों में भारत देश में भ्रटाचार एक बहुत बड़ी बीमारी के रूप में साफ़ दिखाई दिया है जहाँ इतने बड़े बड़े घोटाले सुनायी दे रहे हैं की एक आम भारतीय तो शायद कभी ठीक से पैसे की उस मात्रा और उनकी पूरी गिनती भी न कर पाए। परन्तु जैसे गुलामी के अँधेरे में राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी और अन्य महा पुरुष सक्रिय थे और वे सफल भी हुए उसी प्रकार से आज भी हमारे सामने इस भ्रटाचार रुपी राक्षस से लड़ने के लिए भी नायक उपलब्ध हैं। हम सभी को मिलकर उनके सफल होने की कामना करनी चाहिए। 
आज के लिए बस इतना ही, शेष फिर। जल्दी ही कुछ उपयोगी लेख के साथ उपस्थित होऊंगा। धन्यवाद ।