Sunday, 25 September 2011

प्रथम हिंदी कक्षा - शीत कालीन सत्र २०११

स्कूल्स में गर्मी की छुट्टियों की समाप्ति के साथ ही आज से हिंदी कक्षाएं पुनः शुरू हो गयीं. इस वर्ष अपनी इस कक्षा में हम लोग एक नया मंत्र 'एकात्मता मंत्र' सीखेंगे. और इसे एक प्रार्थना की तरह हर कक्षा के शुरू में अभ्यास करेंगे. मैं यहाँ पर , इस ब्लॉग पर, मंत्र और उसका अर्थ भी लिख रहा हूँ, यदि आप चाहें तो इसकी एक कॉपी प्रिंट कर सकते हैं.

यह सत्र लगभग दिसम्बर में क्रिसमस अथवा जनवरी प्रथम सप्ताह तक चलने का अनुमान है. अपने इस नए सत्र में हम उसी समय सारणी का अनुसरण करेंगे जो हमने अपने ब्लॉग में पहले प्रकाशित कर रखा है [प्रथम और दूसरी कक्षा : २०११ फरवरी माह (प्राथमिक-परिचय समय सारणी) ]. उसके अनुसार आज और अगले सप्ताह हम पुनः अभ्यास करेंगे और देखेंगे की बच्चों को कितना आता है ताकि आगे की कक्षाओं का विषय विस्तार तय कर सकें. इस सत्र में हम लोग बोल चाल की हिंदी भाषा पर ध्यान देंगे और कोशिश करेंगे की बच्चे हिंदी बोलने में संकोच न करें.

आज हमारी एक सहयोगी अध्यापिका रीता जी ने बच्चों को बड़े ही सुन्दर ढंग से हिंदी वर्णमाला के अक्षरों, रंग, विभिन्न पशु पक्षियों के बारे में पूर्ण अभ्यास कराया. शरीर के विभिन्न अंगों पर बना एक सुन्दर गीत भी बच्चों ने सुनाया. मैंने एकता मंत्र का बच्चों को अभ्यास कराया. इसी के साथ बच्चों ने गायत्री मन्त्र का भी उत्तम उच्चारण किया.बच्चों की संख्या लगभग १३ हो गयी थी.

बच्चों के अभ्यास को देखकर लगा की बच्चों ने कुछ तो सीखा ही है और वे हिंदी का उच्चारण करने में बहुत उत्साहित हैं. परन्तु अभी उन्हें बहुत कुछ सीखना है जिससे उनमे हिंदी के प्रति आत्म विश्वास आ सके और वे और अच्छी तरह से हिंदी में वार्तालाप कर सकें. परन्तु यह कार्य तो हम शिक्षक गणों का है और मुझे पूरा विश्वास है हम सभी अभिभावकों सहित यदि मिल कर प्रयास करेंगे तो यह बहुत कठिन कार्य नहीं है.

अपने अगले सत्र में पुनः एकता मंत्र के बाद हम लोग अभ्यास करेंगे और यथा संभव उसके बाद नए विषयों पर चर्चा शुरू करेंगे. बच्चों से घर पर हिंदी में वार्ता लाप करते रहें. याद रहे आपका यह प्रयास आपके बच्चों के लाभ के लिए है. कक्षा पर हमारा अगला अपडेट शीघ्र ही उपलब्ध होगा परन्तु यदि आप हमसे संपर्क करना चाहें तो आप ईमेल (bvmcardiff@yahoo.com) करें.
सारांश में हिंदी वर्ण माला ...............
    स्वर
              अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, अं, अ:
    व्यंजन
              क, ख, ग, घ, ड़         (कवर्ग)
              च, छ, ज, झ, ञ        (चवर्ग )
              ट, ठ, ड, ढ, ण         (टवर्ग )
              त, थ, द, ध, न        (तवर्ग )
              प, फ, ब, भ, म        (पवर्ग )
              य, र, ल, व       
              श, ष, स, ह
              क्ष, त्र, ज्ञ 

अभ्यास हेतु इन्टरनेट की उपयोगी वेबसाइट
    http://www.hindigym .com, http://indif.com
    http://www.hindilearner.com/hindi_resources.php
    http://www.geeta-kavita.com/ और
    http://www.shabdkosh.com 


Friday, 26 August 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - IX : हिंदी भाषा का अंतर राष्ट्रीय परिपेक्ष

भोगौलिक दृष्टीकोण से हिंदी बोलने वाले सारे विश्व में मिलते हैं और इसीलिए ४ वर्ष में एक बार विश्व हिंदी सम्मेलन होता है. अभी तक हुए हिंदी सम्मेलन विश्व के अनेक शहरों जैसे नागपुर, दिल्ली, पोर्ट लोइस (मौरिशियस), लन्दन, सूरीनाम इत्यादि में हो चुके हैं. इसकी महत्ता को पहचानते हुए ही तो यूनाइटेड नेशन ने आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन अपने न्यूयोर्क ऑफिस में २००७ में करवाया था.
                    मेरा ऐसा मानना है कि इस परंपरा का लाभ उठा कर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक और कार्य चालन की भाषा बनाने के लिए भारत सरकार को कदम उठाना चाहिए. भारत में अंग्रेजी का जो वर्चस्व है उसके कारण विश्व में भ्रान्ति है कि भारत को समझने के लिए  भारतीय भाषाओँ को समझना जरूरी नहीं है. यह भ्रान्ति दूर कि जानी चाहिए और शिक्षा, शासन और दैनिक व्यवहार में भारतीय भाषाओँ का अधिकाधिक प्रयोग होना चाहिए. वैसे संयुक्त राष्ट्र कि संस्थाओं में हिंदी का प्रवेश हो चुका है. यह यूनेस्को की एक अधिकारिक भाषा है.
                     हिंदी का विश्व व्यापी प्रचार और प्रसार आकस्मिक अथवा अप्रत्याशित नहीं हुआ है. इसका बहुत बड़ा श्रेय उन प्रवासी भारतीयों को हैं जिन्होंने अपनी हिंदी भाषा को संरक्षण प्रदान दिया. हम उन धरम गुरुओं और प्रचारकों को भी नहीं भुला सकते जिन्होंने हिंदी के माध्यम से अपने अपने मतों का प्रचार किया. इसी प्रकार उन व्यवसाईओं-व्यापारियों कि हिंदी सेवा का मूल्य भी हम शायद कभी आंक नहीं सकते हैं जिन्होंने व्यवसाय और व्यापार का माध्यम हिंदी को ही बनाये रखा.
                  विदेशों में स्थित भारतीयों के अतिरिक्त अनेक विदेशी विद्द्वानों ने भी हिंदी कि लोग संगत मर्यादा और महत्व को जान और पहचान लिया है. सन १६५५ में एडवर्ड टेरी ने अपनी पुस्तक "वोइस टु द इस्ट इन्डीस" में "हिन्दोस्तानी" को भारतीय बोलचाल की भाषा बताया है. सन १७०४ में तुरोनेसिस ने "लेक्सिकन लिंगुआ हिन्दोस्तानिका" नामक कृति प्रस्तुत की. ए हमिल्तन ने सन १७२७ में हिन्दुस्तानी को अपने एक यात्रा विवरण मुग़ल सुल्तान की एक सामान्य भाषा सूचित किया है. सन १८५२ में फ्रांस मैं दिए गए अपने एक भाषण में गार्सा-द-तासी ने 'हिन्दुई-हिन्दुस्तानी' को भारतीय लोकभाषा ठहराया था. इसी प्रकार सन १८८६ में लन्दन में प्रकाशित 'हाब्शन - जाब्शन' कोष में हिन्दुस्तानी (हिंदी) को भारतीयों की राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया है. इससे यह स्पष्ट हो जाता है की विदेशी विद्वान भी हिंदी की वास्तविक स्थिती से परिचित होकर हिंदी सीखने के इच्छुक भी थे. अनेकों विदेशी राष्ट्रों में वहां के विद्वानों ने हिंदी सीखने और सीखाने की दिशा में काफी उत्साह दिखाया है.
                       विदेशों में हिंदी-प्रचार प्रसार हेतु भारत सरकार की ओर से भी प्रयत्न होते रहे हैं. दुनिया के कई देशों में भारत सरकार ने दूतावासों में  हिंदी अधिकारी की नियुक्ति की है. इन हिंदी अधिकारिओं की सहायता से वहां हिंदी के लेखन, हिंदी समाचार पत्रों के संपादन ओर प्रकाशन, रेडियो, दूर दर्शन के प्रसारण ओर हिंदी दिवस पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. ओर इनके आयोजन में इन हिंदी अधिकारिओं का भरपूर सहयोग रहता है. इस सन्दर्भ में उलेखनीय है की मौरिसिअस की भाषा त्रिऔल है जिसमे अनेकों भारतीय भाषाओँ के शब्द सम्मिलित हैं. इसी प्रकार फिजी में संसद के अन्दर सदस्य फीजियन या फिर हिन्दुस्तानी में बोल सकता है. और वहां हिंदी की बहुत सी पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता है जिनमे 'फिजी समाचार', 'शांति दूत', 'जाग्रति', जय फिजी, और सन्देश प्रमुख हैं. बर्मा के रंगून में ब्राह्मण सभा का ऊँचा भवन 'ब्रह्म निकेतन' बर्मा के हिंदी प्रसार के इतिहास का साक्षी रहा है. बर्मा के सभी जिलों में हिंदी पढ़ाने वाले स्कूल हैं. दक्षिण अफ्रीका में शादी व्याह और धार्मिक उत्सवों के समय ख़ास तौर पैर डरबन जैसे शहर में  तो जैसे हिंदी भजनों और संगीत की जैसे धूम सी मच जाती है.जापान में तो १९११ से 'टोक्यो स्कूल फॉर फ़ोरेंन लैंगवेजेस' में हिन्दोस्तानी की पढाई होती है.प्रेमचंद का गोदान, पन्त का स्वर्णकिरण इत्यादि तो जापानी भाषा में अनुदित हो चूका है. सोविएत पाठक तो हिंदी के सभी प्रमुख साहित्य कारों से सुपरिचित हैं. कबीर, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार, भगवती चरण वर्मा, अमृत लाल नगर, उपेन्द्र नाथ अश्क, इलाचंद्र जोशी, जयशंकर प्रशाद, निराला, सुमित्रा नंदन पन्त, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, राम धारी सिंह दिनकर, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, धरम वीर भारती इत्यादि हिंदी साहित्यकार तो सोविएत रूस में बहुत ही लोक प्रिय हैं. इनकी रचनाओ का तो अनुवाद भी हो चूका है.अमेरिका में लगभग ३०-३५ विश्व विद्यालओं में हिंदी के पठन और पाठन की व्यवस्था है. ब्रिटेन में हिंदी प्रसार भारती नामक संस्था हिंदी के प्रचार और प्रस्सर में संलग्न है. यह संस्था हिंदी की कक्षाएं नियमित रूप से चलती है और साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन करती है. 'प्रवासिनी' नामक एक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन भी इस संस्था के द्वारा होता है. उपर्युक्त देशों के अतिरिक्त श्री लंका, हालैंड, फ़िलीपीन्स, वियतनाम, डेनमार्क, चीन, इजराइल, हांग कोंग, सूडान, वेस्ट इन्डीस, गुयाना, जैमैका, नेपाल, भूटान इत्यादि देशों में भी हिंदी के पठन और पाठन की उत्तम व्यवस्था हैं.  
                       विश्व के एक विशाल जन समूह की भाषा होने के कारण राष्ट्र संघ की भाषा बन सकती है.  हिंदी किसी भी क्षेत्र में विश्व की अन्य भाषाओँ से पीछे नहीं है बस केवल चाहिए कि हिंदी भाषी लोग और विशेषतः भारत सरकार अपनी इच्छा शक्ति दिखाये और हिंदी को उसका विश्व स्तरीय गौरव दिलाये. और फिर जनसँख्या, सम्रद्धि और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क कि दृष्टी से भी हिंदी का स्थान विश्व कि अन्य भाषाओँ कि तुलना में कम महत्वपूर्ण नहीं है.
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सहायक ग्रन्थ सूची :

राष्ट्र भाषा की समस्या - डॉक्टर राम विलास शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद    
भारतीय राष्ट्र भाषा - सीमायें और समस्याएं - डॉ सत्यव्रत
संपर्क भाषा हिंदी - डॉ लक्ष्मी नारायण गुप्त

Thursday, 23 June 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - VIII : राजभाषा हिंदी का संघर्ष

भारत के संविधान में राजभाषा के रूप में स्वीकृत हो जाने पर भी व्यवहारिक रूप में हिंदी के विकास में बाधाएं आती ही रहीं. हिंदी के प्रश्न को लेकर कुछ राजनैतिक नेता अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिए जनमानस में ग़लतफ़हमी पैदा करने में ही अपनी भलाई समझने लगे. इस प्रकार से हिंदी की स्थिती को कमजोर करने में बहुत कुछ इन राजनैतिक शक्तियां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से जिम्मेदार जरूर हैं. और हम आज भी देख सकते हैं की भारत की एकता की दुहाई देकर आज भी हिंदी आन्दोलनों का दमन ही किया जा रहा है और सरकारी-गैर सरकारी कार्यो में अंग्रेजी को ही प्राथमिकता मिल रही है. सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है की आज के भारतीय सरकारी तंत्र के कुछ केंद्र बिंदु तो स्वयं ही हिंदी बोल पाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं.भारत की यह स्थिती निश्चित रूप से अंतररास्ट्रीय मंच पर तो जरूर भाषा की भ्रामक स्थिती बनाये हुए है.
१९५६ में प्रदेशों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर करना शायद गलत ही था क्योंकि उसने राजभाषा और क्षेत्रीय भाषाओँ को प्रतिद्वंदियों जैसा बना दिया और दोनों में सहयोग के स्थान पर टकराव की सी स्थिती बन गयी जो आज भी आसानी से देखी जा सकती है. इससे व्यापक राष्ट्रीय भावना के बदले क्षेत्रीय भाषायों को ज्यादा बढ़ावा मिला और इससे स्वार्थी तत्वों ने इसे और भी मुखरित किया. जब १९६७ में हिंदी राजभाषा विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था तो अहिन्दी भाषी राज्यों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. सबसे पुरजोर विरोध के स्वर तो तमिलनाडु प्रदेश से आये. उस समय तमिल भाषा को दोयम दर्जे की भाषा बन जाने के खतरों का प्रचार करने वालों की केवल यह एक राजनेतिक साजिश ही थी. परिणाम स्वरुप न तो इस आन्दोलन से हिंदी भाषा और न ही तमिल भाषा का ही कुछ भला हुआ वरन हमारी इन दोनों भाषाओँ के टकराव की स्थिती में एक विदेशी भाषा को हम पर थोप दिया गया जिसने आज तक हमारी राज भाषा के साथ-साथ सभी क्षेत्रीय भाषाओँ को दोयम दर्जे का बना रखा है.
सामान्य रूप से हिंदी का विरोध करने वाले अधिकांशत: और अंग्रेजी का समर्थन करने वाले लोगों का तर्क है की हिंदी अभी निर्माणावस्था में है और इसमें वैज्ञानिक साहित्य नाम मात्र को है. परन्तु यह सत्य नहीं है क्योंकि हिंदी में पारिभाषिक और वैज्ञानिक शब्दों के अभाव की पूर्ती हो रही है. यह अभाव हिंदी या भारत की किसी अन्य भाषाओँ की अन्तर्निहित स्वाभाविक निर्बलता के कारण नहीं अपितु अंग्रेजी के अनुचित तनाव से उत्पन्न हुआ है. चूंकि हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य की मांग नहीं हुई, इसलिए वैज्ञानिक साहित्य का निर्माण नहीं हुआ. अब यह मांग होने लगी है और हिंदी में वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और बोध्धिक साहित्य का बड़ी प्रबलता से निर्माण हो रहा है. हिंदी का किसी भी युग का साहित्य किसी दूसरी भाषा के किसी भी युग के साहित्य से किसी भी अंश में हीन नहीं है. इसका प्रमाण एक हज़ार वर्षों का हिंदी साहित्य है. 
मैं ऐसा समझाता हूँ हमारा प्रयास यह होना चाहिए की हमारी राजभाषा और क्षेत्रीय भाषाएँ सहचरी बन कर रहें न की प्रतिद्वंदी और राज भाषा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उचित स्थान दिलाकर भारत के प्रति राष्ट्रीय भावना का संचार करें. साथ में विदेशी भाषा का तो निसंदेह केवल न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय उपयोग करना होगा 

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सहायक ग्रन्थ सूची :

हिंदी का राजभाषा के रूप में विकास - डॉक्टर शिवराज शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद


Sunday, 17 April 2011

हिंदी भाषा का इतिहास - VII : आजादी के बाद हिंदी भाषा

स्वाधीनता के आज ६२ वर्ष होने के बाद भी आज तक हम राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्तियाँ साकार नहीं कर पाए.....
            है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी
            हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी

अपने महापुरुषों और पूर्वजों के इन सपनों को हम आज तक साकार नहीं कर पाए हैं और हमारी राज भाषा हिंदी आज भी एक विदेशी भाषा अंग्रेजी से अपने वर्चस्व के लिए लड़ रही है.यह शायद इस लिए भी हुआ क्योंकि आजादी के बाद जब राजभाषा के रूप में हिंदी का मामला आया तब सदस्यों में राजभाषा के नामकरण  "हिंदी" और "हिन्दुस्तानी" को लेकर गंभीर विवाद था. हिंदी को "हिन्दुस्तानी" बनाने  में गाँधी जी भी भूमिका रही, ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि शायद साम्प्रदायीकता के प्रश्न में उन्होंने भाषा जो भी शामिल कर लिया था. जैसे "हिन्दुस्तानी" भाषा "हिंदी" और "उर्दू" भाषा का मिस्त्रण मात्र है. जैसा मैं पहले भी लिख चूका हूँ कि विद्वानों ने उर्दू भाषा को केवल हिंदी में फारसी लिपि का प्रयोग मात्र माना है. भाषा के नामकरण को लेकर शायद यह असमंजस कि स्थिती आज तक बनी हुई है. और आजतक कोई भी तथाकथित भारत की लोकतान्त्रिक सरकारें द्वारा इस धार्मिक-साहित्यिक विषय को सुलझाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ. परिणाम, आज तक हम अपनी राज भाषा और राष्ट्र भाषा के लिए चर्चा और संघर्ष कर रहे हैं.

वैसे भारत के संविधान में हिंदी की स्थिति इस प्रकार है....
विधान के अनुच्छेद ३४३(१) में साफ़ तौर पर यह  निर्दिष्ट है कि संघ कि राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा. साथ ही यह भी कहा गया है कि उपयुक्त व्यवस्था बनाने तक अर्थात पंद्रह वर्ष कि अवधि तक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा.
अनुच्छेद ३४३(२) में किसी बात के होते हुए भी संसद उक्त पंद्रह वर्ष कि कालावधि के पश्चात विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का, अथवा, अंकों के देवनागरी रूप का, ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग अनुबंधित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लेखित हो.
अनुच्छेद ३४४ में राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। प्रयोजन यह था कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग हो, संघ और राज्यों के बीच राजभाषा का प्रयोग बढ़े, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को सीमित या समाप्त किया जाए।
विधान के अनुच्छेद ३५० में निर्दिष्ट है कि किसी शिकायत के निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को संघ में या राज्य में प्रयोग होनेवाली किसी भाषा में प्रतिवेदन देने का अधिकार होगा।
१९५६ में अनुच्छेद ३५० क संविधान में अंतःस्थापित हुआ और यह निर्दिष्ट हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए।
हिंदी भाषा के विकास के लिए यह विशेष निर्देश अनुच्छेद ३५१ में दिया गया कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके एवं उसका शब्द भंडार समृद्ध और संवर्धित हो।

ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी अपने एक लेख में लिखते हैं
"भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे भाषाएँ भारतीय स्वाधीनता के अभियान और आंदोलन को व्यापक जनाधार देते हुए लोकतंत्र की इस आधारभूत अवधारणा को संपुष्ट करतीं रहीं कि जब आज़ादी आएगी तो लोक-व्यवहार और राजकाज में भारतीय भाषाओं का प्रयोग होगा।"

महात्मा गांधी ने भागलपुर में महामना पंडित मनमोहन मालवीय का हिंदी भाषण सुनकर अनुपम काव्यात्मक शब्दों में कहा था, ''पंडित जी का अंग्रेज़ी भाषण चाँदी की तरह चमकता हुआ कहा जाता है, किंतु उनका हिंदी भाषण इस तरह चमका है - जैसे मानसरोवर से निकलती हुई गंगा का प्रवाह सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता है।'' आज भी हमारे समय में हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का प्रत्येक भाषण भी इसी प्रकार सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता हुआ गंगा के प्रवाह की तरह लगता है। फिर भी कुछ बात है की हम अपनी राज भाषा के प्रति या तो उदासीन हैं और या फिर हमें उदासीन बनाये रखा जा रहा है.

अत: हमें जागना होगा और देश प्रेम के साथ भाषा प्रेम को भी अपने परिचय का आधार बनाना ही होगा. वह भाषा चाहे हिंदी के सहचरी के भांति क्षेत्रीय भाषाएँ ही क्यों न हो परुन्तु हमें अपने मानसिक दासता के प्रतीक एक विदेशी भाषा के विरोध में स्वयं को और अपने बच्चों को जागरूक बनाना होगा. हमें याद करना होगा भारतेंदु जी का यह कथन .......
                   ''निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।''

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सहायक ग्रन्थ सूची :

हिंदी का राजभाषा के रूप में विकास - डॉक्टर शिवराज शर्मा
राज भाषा हिंदी - डॉ मालिक मोहम्मद

इन्टरनेट :
http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/hindi_diwas/samvidhan_me_hindi.htm (20-March-2011)

Monday, 7 March 2011

दिनांक ०६-०३-२०११

हिंदी-ब्लॉग परिवर्तन - मार्च 2011 
कुछ समय से मुझे ऐसा लग रहा था कि यह ब्लॉग बड़ा ही एकाकी और उबाऊ सा हो रहा है क्योंकि रोजाना कक्षा के बारे में सामान्य गतिविधियों को लिख लिख कर लेखों में नवीनता सी नहीं आ रही थी.  इसका एक कारण यह भी है कि साल २०१० के लेखों में भी कक्षाओं का विवरण उपलब्ध है और कक्षा का स्वरुप अथवा समय सारणी कैसी हो यह हम साल २०११ के प्रथम और दूसरे कक्षा विवरण से (गैर व्यावसायिक उपयोगों के लिए) प्राप्त कर सकते हैं. अब नित्य यहाँ पर हम कक्षाओं का विवरण नहीं देंगे वरन इस ब्लॉग का उपयोग हिंदी के प्रचार और प्रसार और हिंदी पर चर्चा करने में लगाया जायेगा. 
फिर भी यदि ऐसा लगा कि कक्षा में यदि कुछ भी उल्लेख करने योग्य हुआ तो उससे हम अपने इस ब्लॉग में स्थान जरूर देंगे. इसके अतिरिक्त आपके सुझाव पर भी हम जरूर टिप्पणी करेंगे. हम देव भाषा संस्कृत की भी यहाँ पर चर्चा करेंगे.
                   इस प्रकार से यह ब्लॉग कुछ संवादात्मक (इन्टरैक्टिव) और जीवंत सा भी लगेगा.कुछ विचार विमर्श और सुझाव के आधार पर इस ब्लॉग का नाम "राजभाषा हिंदी २०१०" बदला गया है.आपको नियमित साप्ताहिक लेख शायद न मिले परन्तु लेखों की आवृत्ति निरंतर बनी रहेगी. अपने इस परिवर्तन का  स्वागत हम हिंदी के हास्य कवि श्री ऋषि गौढ़ जी द्वारा रचित हास्य कविता के साथ करते हैं . यह संस्कृत में  अनुवादित है........

"आधुनिक विद्यार्थी:
एकलव्य: भांति
ना ददाति अन्गुठम कर्तिरित्वंम
समर्पियतम गुरु: दक्षिणाम:
अन्गुठम प्रदर्शयम:"

कृपया अपने सुझाव और विचार हम तक भेजते रहें.
धन्यवाद

Tuesday, 22 February 2011

चौथी कक्षा : २० फ़रवरी २०११

आज की प्राथमिक कक्षा में मुख्यतः कपिल जी की जिम्मेदारी थी और रवि जी सहायक की भूमिका में थे. कक्षा में उन्होंने स्वरों का बच्चों को अभ्यास कराया. कुछ बच्चे तो अच्छी गति से सीख रहे हैं मगर जो बच्चे इस साल नए हैं उनके लिए थोडा समय लग रहा है मगर रवि जी और कपिल जी दोनों का ही यह विशवास है की वे आपेक्षित गति से जल्दी ही भाषा सीख लेंगे. अगले सप्ताह स्वर-व्यंजनों के उच्चारण और लेखन का अभ्यास जारी रख्खा जायेगा.
परिचय कक्षा की जिम्मेदारी मेरी थी और बच्चों ने आज मात्राओं का और अभ्यास किया और साथ में कुछ रंगों का हिंदी में उच्चारण किया. बच्चे अब कक्षा में हिंदी में बात करते हैं. इसलिए यह महत्वपूर्ण है की यदि आप भी घर पर बच्चों से हिंदी में बात करें और उन्हें प्रोत्साहित करें तो उनका हिंदी ज्ञान और बढेगा और वे कक्षा में और अधिक उत्साही हो कर आयेंगे. परिचय कक्षा में ग्रह कार्य के लिए एक फोटो रंग करने के लिए दी गयी है और साथ में बच्चों को कुछ नए रंगों को ढून्ढ कर लाना है. आज कक्षा में बच्चों से बताया गया की अगली कक्षा से वे एक नोट पैड या फिर रजिस्टर भी लायें उसपर बच्चे हिंदी लेखन का अभ्यास करेंगे.अगली परिचय कक्षा में हम लोग १ से १०० तक नंबर और कुछ हिंदी के वाक्य बनायेंगे.
                    आज के सत्र का समापन बड़ा ही अव्यवस्थित रहा. इस अव्यवस्था से यदि आपको कोई भी असुविधा हुई हो तो हम क्षमा प्रार्थी है. अगले सप्ताहांत मैं कुछ निजी काम से नगर से बाहर हूँ और मैं कक्षा नहीं ले सकूँगा. परन्तु अन्य स्वयंसेवक और स्वयंसेविकाएं परिचय कक्षा का सञ्चालन करेंगे. प्राथमिक कक्षा की जिम्मदारी रवि जी की है और आशा है हमारी हिंदी कक्षा सुचारू रूप से संम्पन्न होगी. कृपया अपने सुझाव हमें भेजते रहें 
धन्यवाद

Tuesday, 15 February 2011

तीसरी कक्षा - २०११

आज प्राथमिक कक्षा में कुछ और स्वरों के लिखने और उच्चारण का अभ्यास कराया. आज प्राथमिक कक्षा की मुख्य जिम्मेदारी रवि जी की थी. परन्तु आज कपिल जी भी आ गए थे तो कपिल जी ने कक्षा में सहायक की  भूमिका निभाई. गृह कार्य हेतु बच्चों को स्वरों का घर पर अभ्यास करने को कहा गया है. अगली कक्षा में स्वरों और व्यंजनों के अभ्यास को आगे ले जाया जायेगा.

परिचय कक्षा में आज हम लोगों ने बच्चों के मात्रा ज्ञान का अनुमान लगाया. हिंदी भाषा में मात्रा का ज्ञान होना बहुत आवशक है क्योंकि सभी वाक्यों को लिखने में हमें मात्राओं का ज्ञान तो होना ही चाहिए.  परिचय कक्षा की जिम्मेदारी मेरी थी.  परिचय कक्षा में बच्चों को मात्राओं का अच्छा गृह कार्य दिया गया और अभिभावकों से  अपेक्षा है की वे बच्चों को उनके गृह कार्य में प्रोत्साहित करेंगे. अगले सप्ताहांत हम लोग इन्ही मात्राओं के लेखन का अभ्यास करेंगे इसलिए यह बहुत जरूरी है कि बच्चे अपना गृह कार्य कर के आयें. साथ में हिंदी में विभिन्न रंगों का बच्चों को परिचय कराएँगे

उषा जी हमेशा की तरह सभी कक्षाओं में अतिरिक्त सहायक के रूप में अपनी जिम्मेदारिओं का निर्वहन कर रहीं थी. तो इस प्रकार आज कक्षा में हम सभी सहयोगी उपस्थित थे. अपनी कक्षा का समापन हमेशा की तरह कुछ खेल, योगासन और फिर गायत्री महामंत्र के साथ हुआ. अगली कक्षा में कपिल जी प्राथमिक कक्षा के मुख्य शिक्षक हैं और मैं परिचय कक्षा हेतु. आज की कक्षा में बच्चों की भी संख्या लगभग १८ हो गयी थी. बहुत अच्छा रहा .

आशा है आप लोगों को कक्षा के समय सारणी से लाभ मिल रहा होगा और आप इस ब्लॉग की मदद्दत से कक्षा के अन्दर का हाल समझ पा रहे होंगे. आपसे इतना ही अनुरोध है की आप भी हम सभी के साथ मिलकर अपने बच्चों के हिंदी अध्धन में मद्दत करें उनको घर में प्रेरित करके और स्वयं भी बच्चों से हिंदी में बोल के और उन्हें प्रेरित करें.

आज हिंदी की दोनों ही कक्षाओं में प्रवेश लेने का अंतिम दिन था. अत: आज के बाद अब नए प्रवेश नहीं लिए जायेंगे. नए प्रवेश पत्र अब अगस्त माह में खुलेंगे और नए बच्चों को उसमे प्रवेश मिल सकेगा. कुछ बच्ची अगस्त में प्राथमिक से परिचय कक्षा में प्रवेश पाएंगे. इसलिए बच्चों के साथ मेहनत करते रहिये अगर आपको लगता है कि हमारे बच्चों को हिंदी आनी ही चाहिए. और हमारा भी मार्ग दर्शन करते रहिये अपने सुझाव और आपेक्षाएं भेज कर.

अंत में, हम लोग अभी भी सूर्यनमस्कार योगासन से सम्बंधित सूचना के लिए आपके जवाब की प्रतीक्षा मैं हैं. हम लोगों को अभी तक केवल ३ उत्तर आयें हैं. यदि आप इच्छुक है कि आपका बच्चा अपनी हिंदी कक्षा के बाद खेल कूद और योगासन में भाग ले तो कृपया एनरोलमेंट एंड सूचना पत्र में हस्ताक्षर कर के भेज दें.
धन्यवाद